तपोभूमि प्रणेता प्रज्ञा सागर महाराज पुस्तक मेरी किताब से संकलित आलेख भक्ति की शक्ति
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया।सब जीवों को मोक्षमार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया।
बुद्धवीर जिन हरि-हर ब्रह्मा या उसको स्वाधीन कहो।भक्तिभाव से प्रेरित हो यह चित्त उसी में लीन रहो ॥
पूज्य गुरुदेव कहते हैं कि परमात्मा को पाने के दो ही मार्ग है। पहला भक्ति मार्ग और दूसरा योग -मार्ग। भक्ति मार्ग में भावना महत्वपूर्ण है और योग-मार्ग में साधना ।भक्ति मार्ग में साकार परमात्मा की आराधना होती है और योग मार्ग मेंनिराकार स्वरूप की साधना। भक्ति मार्ग परावलंबन पर आधारित होता हैऔर योगमार्ग स्वावलंबन पर प्रतिष्ठित होता है। इसलिए वेदों में भक्ति मार्गको द्वैत और योगमार्ग को अद्वैत कहा हैं। भक्ति मार्ग पर चलकर परमात्माको पाया जा सकता है, और योग-मार्ग पर चलकर परमात्मा बना जासकता है। एक में पाना होता है, दूसरे में होना होता है। पाने का अर्थ है-अपनी भक्ति के सहारे परमात्मा का दीदार/दर्शन करना।
सेठ सुदर्शन और चंदनबाला का उदाहरण देते हुए गुरुदेव कहते हैं कि
सेठ सुदर्शनऔर चंदनबाला ने प्रभु महावीर का किया। आचार्य कुन्दकुन्द ने सीमंधर स्वामी का किया यह भक्तिमार्ग के सहारे परमात्मा को पाना है और होने का इसका अर्थ आत्मा में परमात्मा की साक्षात् अनुभूति। भक्ति जब पराकाष्ठा परपहुँचती है तो योग में रूपान्तरित होने लगती है। योग- जो आत्मा का ‘अप्प परमात्मा से संयोग करा देता है। योग/ध्यान के माध्यम से ही परमप्पा’ की अनुभूति होती है। श्रावक के लिए भक्ति का मार्ग श्रेष्ठ सुगम है।इसलिए आचार्य कुन्दकुन्द देव ने स्यणसार ग्रंथ में लिए दान और पूजा को भक्ति-मार्ग का प्रमुख अवलंबन बतलाते है।

दाणं पूया मुक्खं, सावयधम्मे ण सावयातेण विणा
अर्थात् श्रावक धर्म में, भक्तिमार्ग में दान और पूजा मुख्य कर्तव्य है।
इनके बिना श्रावक, श्रावक नहीं, संत-सन्यासी के लिए,लिए योग का मार्ग, ध्यान का मार्ग श्रेष्ठ और सरल है।साधु-तपस्वी केभक्ति के चार आयाम है- समर्पण, प्रेम, प्रार्थना और प्रतीक्षा।भक्ति के मार्ग की पहली शर्त है कि भक्त के भीतर समर्पण की भावनाहोना चाहिए। समर्पण के पश्चात् प्रेम का उद्वेग होना चाहिए, प्रेम के साथपरमात्मा को पाने की गहरी प्यास अर्थात् प्रार्थना होना चाहिए और प्रार्थनाके पश्चात् परमात्मा के आगमन की पूर्ण प्रतीक्षा होना चाहिए। योग मार्ग के चार आयाम है- समर्पण के स्थान पर संकल्प, प्रेम केस्थान पर धैर्य, प्रार्थना के स्थान पर साधना और प्रतीक्षा के स्थान पर परीक्षा
परीक्षा। यानी संकल्प, धैर्य, साधना और परीक्षा जो साधक किये हुए
संकल्प की धैर्य पूर्वक साधना करता हैं वही योग की परीक्षा में उत्तीर्ण हो
परमात्मा को पाता है। दोनों मार्ग- परमात्मा से मिलाने वाले, परमात्मा कोउपलब्ध कराने वाले हैं। आचार्य मानतुंग ‘त्वद्भक्ति रेव मुखरी कुरूतेबलान्मान्’ का जयघोष करके परमात्मा तक पहुँचे और आचार्य कुन्दकुन्द देव ने गुफाओं में बैठकर योग/साधना के बल से परमात्मा का साक्षात्कार किया।
भक्ति का अवलंबन चाहिए। भक्त परमात्मा को रूपाकार कर उसका सहारा लेकर स्वयं को समर्पित कर देता है। भक्ति में दूसरे की उपस्थिति चाहिए। लेकिन भक्ति मार्ग योग मार्ग और ज्ञान मार्ग की अपेक्षा सरल सहज सामान्य और सुलभ होता है। अन्य मार्ग की अपेक्षा भक्ति मार्ग में सुलभता है।
मेरी किताब पुस्तक से संकलित लेख के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
