जिसके हृदय में भगवान की भक्ती प्रकट हो जाती है,उसके मन के सभी संकल्प विकल्प शांत हो जाते हें, प्रमाण सागर महाराज
इंदौर
जिसके हृदय में भगवान की भक्ती प्रकट हो जाती है,उसके मन के सभी संकल्प विकल्प शांत हो जाते हें,लेकिन जहा संकल्प विकल्पों के मगरमच्छ होते है वह कभी भव सागर को तो छोड़ो एक नदी भी पार नहीं कर सकता है”
उपरोक्त उदगार संत शिरोमणि आचार्य गुरुदेव विद्यासागरजी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने आचार्य मानतुंगाचार्य द्वारा रचित “भक्तामर
स्त्रोत्र”की व्याख्या करते हुये प्रकट किये।उन्होंने उदाहरण देते हुये कहा कि एक पंडित जी थे वह रोज कथा सुनाते थे कथा सुनाने से पहले वह रोज दूध पीते थे एक ग्वालिन रोजाना उनको दूध देने आती थी बरसात का समय था नदी में पानी का प्रवाह होंने के कारण रोज लेट हो जाती थी पंडित जी उसे डांटते वह सहजता में उनसे क्षमा मांग लेती एक दिन फिर उसे दूध लाने में विलम्ब हुआ तो वह चुपचाप आकर बैठ गयी पंडित जी की कथा चल रही थी उसने सुना कि “भगवान का नाम लेने बाला भवसागर से पार हो जाता है” जिसका नाम लेने से भवसागर से पार हो जाता है तो क्या में इस नदी को पार नहीं कर पाउंगी,और वह दूसरे दिन जब नदी चढ़ाव पर थी तो उसने भगवान का नाम लिया और नदी के ऊपर ऐसे चल दी जैसे सड़क पर चल रही हो और समय से पूर्व वह पंडित जी के पास पहुंच गई तब पंडित जी ने उससे पूछा तो उसने जो सच था बह बता दिया कि कल आपने ही तो कहा था कि भगवान का नाम लेंने से भवसागर से पार हो जाता है,तो यह तो एक नदी ही हे मेंने भगवान का नाम लिया और पार आ गयी।
पंडित जी को बड़ा आश्चर्य हुआ और विश्वास नही हुआ और वह उस ग्वालिन के साथ नदी पार करने पहुंचे तो ग्वालिन तो भगवान का नाम लेकर पार हो गयी और पंडित जी ने जैसे ही नदी में कदम रखा तो गप्प से वह डूब गये।
मुनि श्री ने कहा कि भक्ती के अंदर विशेष शक्ती सहजता सरलता और निश्चलता से प्रकट होती है। जिसके हृदय में।भक्ती होती है,उसके मन में सभी विकल्पों से शांती मिल जाती है मुनि श्री ने कहा कि आचार्य मानतुंगाचार्य ने भक्तामर के तृतीय और चतुर्थ काव्य में “चंद्रमा के प्रतिबिंब को पकड़ने वाली चेष्टा कही है”वही दूसरी ओर “लहराते हुये सागर को बाहु के बल से पार करने का प्रयास किया है” जंहा पहला प्रयत्न बचकाना है, तो दूसरा प्रयत्न दुस्साहसी है यहा पर आचार्य श्री कहते है कि में आपका भक्त हूं आपकी भक्ती करने के लिये तत्पर हूं’ मुझे नहीं मालुम कि मेरी सामर्थ क्या है,लेकिन “जिसके हृदय में भक्ती होती है उसके अंदर आपकी ही शक्ती होती है” में आपको देखता हूं तो मुझे धरती पर ही आप चांद के रुप में नजर आते हो,आसमान के चांद को भले में नहीं छू सकता लेकिन धरती के इस चांद को छूने की सामर्थ मेरे अंदर है जल में उभरने वाला आपका “प्रतिबिम्ब” तो जल के चंचल होते ही बिगड़ सकता है,लेकिन आप तो मेरे हृदय के सागर में उमड़े हो में जितनी भक्ती करता हूं उतनी उतनी मुझमें स्थिरता आती जाती है।
मुनि श्री ने कहा कि “भक्ती की प्रगाढ़ता विकल्पों को शांत करती है” जैसे चंचल जल में चंद्रमा का प्रतिबिंब नजर नही आता उसी प्रकार चंचल मन में कभी भक्ती संभव नही,मन में स्थिरता होगी तभी भक्ती अखंडित होगी” उपरोक्त जानकारी प्रवक्ता अविनाश जैन एवं मीडिया प्रभारी राहुल जैन ने देते हुये बताया आगामी 4- 5- 6अक्टूबर शनिवार रविवार एवं सोमवार को मुनिसंघ का प्रवास गौम्मटगिरी की ओर रहेगा एवं विशेष कार्यक्रम आयोजित किये जाऐंगे।धर्म प्रभावना समिति के अशोक डोसी,महोत्सव अध्यक्ष नवीन आनंद गोधा महामंत्री हर्ष जैन ने समस्त बंधुओं से उपरोक्त कार्यक्रम में सहभागिता कर धर्म लाभ लेंने की अपील की है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
