किसी के गलत कार्य करने पर जानते हुए भी मौन रह जाना, ये है सबसे बड़ा पाप : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज*

धर्म

किसी के गलत कार्य करने पर जानते हुए भी मौन रह जाना, ये है सबसे बड़ा पाप : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

सागर

परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 सुधासागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन मे भाग्योदय तर्थ में कहा कि विपरीत वृत्ति वालों के प्रति मध्यस्थ भाव रखना चाहिए, माध्यस्थ भाव रखना हमारा धर्म या स्वभाव नहीं है, हमारी मजबूरी है क्योंकि सामने वाला विपरीत बुद्धि वाला है और उस विपरीत बुद्धि वाले को हम अपने अनुकूल बना नहीं सकते, असमर्थ है।

 

 

यही कोई विपरीत बुद्धि वाला है तो हमारा पहला कर्तव्य है उसे अनुकूल बनाओ, यदि अपने अनुकूल बनाने का प्रयास नहीं किया और माध्यस्थ भाव रख लिया तो आपका यह माध्यस्थ भाव द्वेष भाव में, कषाय भाव मे आएगा क्योंकि तुम उसका नाश करना चाहते हो। नाश करने का यही तरीका नहीं है कि उसका

 

 

 

बुरा करना, उसका विनाश करना। नाश करने का तरीका ये भी है कि कोई गलत कार्य कर रहा है तो मौन रह जाना।

विनाश के दो तरीके है- कूटनीति वाला जो है वह सामने वाले का विनाश नही करता क्योंकि विनाश करने में हमें आरोप आएगा, दुनिया कहेगी इसने उसको मिटा दिया और दुश्मन भी हमसे बैर साधेगा क्योंकि हमने उसको मिटाया है तो कल वो हमें मिटाएगा। सबसे ज्यादा खतरनाक है कि उसका होकर के मिटाना जिसे आस्तीन का सांप कहते हैं। आमने-सामने आकर हमारी बुराई करने वाले कम है लेकिन अपना होकर हमारा विनाश करने वालों की संख्या बहुत है।

 

 

इनसे बड़ा एक और दुश्मन है जो सामने वाले के दोष देखकर के मौन हो जाता है, अपन को कुछ नहीं बोलना मरने दो, ये सबसे बड़ा कूटनीतिज्ञ दुश्मन कहलाता है, यदि ऐसा आपका भाव है तो आप सबसे ज्यादा कषायी व्यक्ति हो। यहाँ नीति क्या है यदि मैं उसे बचा सकता हूँ तो बचाने का प्रयास करो। एक बार कह दो कि सूरदास आगे मत जाओ, गड्ढा है, फिर जाये तो जाये। सज्जन की कोई गलती नहीं होती तब भी वह क्षमा मांग लेता है, वह क्षमा नहीं मांग रहा है अपना स्टेटस बढ़ा रहा है क्योंकि बड़े आदमी जितना झुकते हैं उतना उनका मान बढ़ता है। बड़ा आदमी यदि है तो वह वीआईपी गेट से नहीं जाएगा क्योंकि वो कहता है कि हजारों लोग खड़े हुए हैं, मैं इनकी बद्दुआ नहीं लूँगा और जाकर के लाइन में खड़ा हो गया, वो लाइन में खड़ा नहीं हुआ है उसने अपने बड़प्पन को सौ गुना और बड़ा कर लिया है। तुम्हारे झुकने से तुम्हारा मान खत्म नहीं होता, तुम्हारा सम्मान बढ़ता है। अकड़ने वालों का सम्मान घटता है।

बड़ों के सामने तो हर व्यक्ति कुदरत से छोटा है, छोटे के सामने छोटे बन जाओ तो यही तुम्हारा बड़प्पन है। हमेशा ध्यान रखना पुण्यहीन के लिए क्यों बचाना, पुण्यहीन की सहायता क्यों करना, महान आत्माएं कहती है जो संसार में बड़ा बनना चाहता है, संसार में यश लूटना चाहता है तो वह पुण्यवान की पूजा छोड़ देगा और पुण्यहीन का पेट भर देगा। एक व्यक्ति मंदिर के लिए चढ़ाने की सामग्री ले जा रहा था और रास्ते में उसे कोई भूखा व्यक्ति मिल गया कि आज उसे भोजन नहीं मिलेगा तो वह मर जाएगा, खा भी लगा तो 6 घंटे बाद में फिर भूखा हो जाएगा, तुम उसकी किस्मत थोड़ी बदल दोंगे। दूसरा व्यक्ति कहता है कि मैं यह सामग्री भगवान के लिए लाया हूँ, मैं पूजा की सामग्री उसे नही दूँगा। एक ने संसार का यश लूट लिया और एक भगवान का भक्त बन गया।

दी हुई वस्तु जीवित नहीं रहती लेकिन विपदा में जो क्षण भर को भी काम आ जाए तो उसका यश जन्म जन्मांतरों तक जाता है। अपने से छोटा, अपने से कमजोर चाहे ज्ञानहीन हो, चाहे धनहीन हो, चाह शक्तिहीन हो, उस पर कभी अपना बड़प्पन मत दिखाना। शक्तिहीन पर शक्ति का रौब नहीं दिखाना, कुरूप पर रूप का मद मत दिखाना, हो सके तो कुरूप से हाथ मिला लेना, तुम्हारी सुंदरता सौ गुना और बढ़ जाएगी। कभी विवाह के लिए बच्चे बच्ची देखने जाते हैं तुम मना करने के लिए हजार बहाने बना दो लेकिन किसी को बुरा मत बोलना, ऐसा झूठ बोलना भी, मायाचारी भी प्रशंसनीय है ध्यान रखना।

भगवान के सामने झुकना जरूरी नहीं है, एक दिन यदि हम भगवान के चरणों में न जा पाये तो हमारे मुनिव्रत में कोई फर्क पड़ने वाला नही है लेकिन एक बार भी चींटी को न देख पाऊँ, उसके लिए न झुक पाऊँ तो मुनिपद सर्वनाश हो जाएगा। चींटी को बचाओ, वो तो मरेगी लेकिन तुझे बचाने का पुण्य मिल जाएगा, अहिंसा परमधर्म तेरा हो जाएगा। पुण्यहीन व्यक्ति को तुम्हारे पुण्य से कुछ नहीं होने वाला, वो तो पुण्यहीन किस्मत लिखाकर आया है लेकिन तुम बहती गंगा में हाथ धो लो, एक टाइम भोजन करा करके, एक रोटी का टुकड़ा देकर के। वह तो भिखारी है तो भिखारी रहेगा। सारा जगत कहेगा रोटी बनाई थी अपने लिए, देखो कितना दयालु है, वही रोटी उसने भिखारी के कटोरे में डाल दी।

एक अनजाना व्यक्ति जो नहीं जानता है और वो उधर जा रहा है, तुम जानते हो फिर भी तुम मौन हो गए, ये मौन वाला सबसे बड़ा पापी होता है इसलिए माध्यस्थ भाव धारण मत करना, माध्यस्थ भाव धारण करना मजबूरी है। जब भी किसी दुखी व्यक्ति को देखो तुम्हारे मन में पहला भाव आना चाहिए मैं इसको कैसे बचाऊं, मैं कैसे इसका दुख दूर करूँ, मैं कैसे इसका आंसू पोंछू। ये है पहले धर्मात्मा का भाव।

               संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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