जिस दिन तुमने स्वयं को संसार का सबसे बड़ा पापी मान लिया, उसी दिन से तुम धर्मात्मा बनना शुरू हो जाओगे : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में मंगल प्रवचन देते हुए निर्यापक श्रमण मुनि पुंगव 108 श्री सुधा सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि जितना व्यक्ति अच्छा बनने का पुरुषार्थ कर रहा है उतना अच्छा वो बन नहीं पा रहा है, जितनी ऊंचाई को छूने का प्रयत्न कर रहा है, उतना ऊँचा उठ नही पा रहा। मेहनत करने पर भी सफल नही हो रहा, जब तक तुम्हारा यह कहना रहेगा, तब तक जाओ तुम्हें कभी सफलता नहीं मिलेगी क्योंकि तुम धारणा बन चुके हो कि मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ, फेल होना तुम्हारा प्रमाण पत्र है कि तुमने कुछ भी नहीं किया।
सबसे बड़ी सामायिक करने वाले का लक्षण, कोई कितना ही कहे बहुत सामायिक, बहुत ध्यान करता हूँ, ये सब थोथा है, परीक्षा का समय है कि प्रतिकूल परिस्थिति में उसकी क्या अनुभूति हो रही है। प्रतिकुल परिस्थिति में यदि परिणामों में संक्लेश आ रहा है, समझ लेना चाहिए आपने सामायिक की नही है, सामायिक का नाटक किया है। दिन में तीन बार सामायिक करे, डेढ़ दो






घण्टे, कितना भी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाये वो अस्थिर नही हो सकता, उसकी सहिष्णुता बनी रहेगी कि लोग दंग रह जायेंगे।
महाराज श्री ने कहा की 6 महीने के लिए मेरा कहना मान लो- जितनी मेहनत करना चाहिए, मैं नही कर रहा हूँ। जितना पढ़ना चाहिए, उतना मैं नहीं पढ़ रहा हूँ, जितना इसमें परिश्रम चाहिए, उतना मेरी करने की शक्ति नही है, सफल कैसे होऊँगा। जितनी और जैसी सामायिक करना चाहिए, मैं कर ही नही पा रहा हूँ मुझे कैसे समता भाव आएगा, ये सोचना तुम चालू करो, बहुत बड़ा रिजल्ट आएगा। मैंने पूजा की ही नहीं, जैसी पूजा करना चाहिए। मैंने माला फेरी ही नहीं, जैसी माला फेरनी चाहिए।
सब तरफ से अपने आप को नेगेटिव कहो, जैसे ही नेगेटिव कहोगे, बस तुम्हारी शक्तियाँ जागना चालू हो जाएगी। जिस जिस कार्य में तुम फेल हो, सारा दोष अपने ऊपर ले लो, ये सब मेरी गलती है, मैंने सही पुरुषार्थ नहीं किया इसलिए मैं फेल हो गया और जितना अपने आपको दोषी बनाते जाओगे, बस अगली साल के लिए अच्छे नम्बर की तैयार कर लीजिये, आपके बहुत अच्छे नम्बर आयेंगे। किसी की गलती नहीं है, मैं ही गलत को सही मानता रहा।
शिक्षाप्रद एवं प्रेरणादायक उद्बोधन देते हुए महाराज श्री ने कहा कि
किस्मत को कभी कोसना नहीं और किस्मत के भरोसे रहना नहीं क्योंकि किस्मत का कोई भरोसा नहीं, एक दिन में राजा से रंक बना दे और रंक से राजा बना दे। दूसरा किसी ऊपरी शक्ति को दोष मत देना नहीं तो ऊपरी शक्ति तुम्हारा नाश कर देगी और कभी भगवान को दोष नहीं देना कि भगवान मेरे से नाराज है, आजकल मेरे ऊपर गुरु कृपा नहीं है, अब तुम्हारा विनाश निश्चित है। कितने ही बुरे दिन आ जायें, भगवान को मत कोसना। किसी भी निमित्त के प्रति परिणाम मत लाना, सब मेरी गलती है या तो कल की थी या आज कर रहा हूँ।
तुम गुरु के पास इसलिए आये हो कि ये ज्ञानी ध्यानी है, गुणवान है, ख्याति प्राप्त है, सारा जगत इनकी प्रशंसा कर रहा है, यदि इसलिए तुमने गुरु को चुना है तो तुम चूक जाओगे। भगवान क्या है, गुरु क्या है, तत्व क्या है, अच्छाई क्या है, ये नही जानना, बस तुम्हे एक बात जानना है, संसार का सबसे बड़ा पापी मैं हूँ।
गुण नहीं है और गुणवान मानना यह पतन का कारण है। दूसरा गुण है, तब गुणवान मान रहा है इसमे पतन तो नही होगा लेकिन तुम प्रशंसा के पात्र नही हो, तुम्हारा विकास रुक जाएगा। अब तीसरा गुण होते हुए भी कहना है कि मेरे पास कुछ भी नही है, अब तुम्हारा विकास शुरू हो जाएगा। चौथा दुर्गुण है फिर भी दुर्गुणी नही मानना ये विनाश का कारण है, अंत मे तुम्हें जाना है कि तुम्हारे में वो दुर्गुण नही है, फिर भी तुम्हे स्वीकार करना है, मैं इन दुर्गुणों से भरा बैठा हूँ, ये साहस आ गया तो तुम क्षयोपशम लब्धि के अधिकारी हो जाओगे। जिस दिन तुमने स्वयं को संसार का सबसे बड़ा पापी मान लिया, उसी दिन से तुम धर्मात्मा बनना शुरू हो जाओगे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
