अर्हम योग प्रणेता प्रणम्य सागर महाराज सानिध्य में 10 लक्षण पर्व के शिविर में जो ऊर्जा धर्म ध्यान करने से मिलती है वह पूरे वर्ष बनी रहती है प्रशांत जैन खानपुर
खानपुर
यह सभी भली-भांति जानते हैं कि अर्हम योग प्रणेता मुनि श्री108 प्रणम्य सागर महाराज जिन्हें पुरा आचार्य विद्यासागर महाराज से दीक्षित संघ सरस्वती पुत्र के नाम का संबोधन देता है। उन्हीं के सानिध्य में 10 लक्षण पर्व में सातवीं बार लगे
अर्हम स्वधर्म शिविर में सम्मिलित होकर पुण्य अर्जन कर लोटे मुनि भक्त प्रशांत जैन ने जयपुर में इस शिविर में भाग लेकर आने के बाद अपने अनुभव को सांझा किया।
यह बताते हैं कि दसलक्षण पर्व में जहां मुनिश्री विराजमान होते है वहां यह शिविर लगाया जाता है। यह मेरे लिए पुण्य का अवसर था कि मुझे इस शिविर मे जाने का सातवीं बार सौभाग्य मिला।
शिविर के अनुभव को बताते हुए उन्होंने दैनिक दिनचर्या को बताया की







प्रातःकाल मंगलमय शुरुआत अर्हम प्रार्थना से होती है जहां सभी शिविरार्थियों को हल्के व्यायाम-प्राणायाम के साथ अर्हम योग भी कराया जाता है।इसके पश्चात श्रीजी का अभिषेक-शान्तिधारा-पुजन के बाद मुनिश्री के श्रीमुख से तत्वार्थ सुत्र के एक अध्याय का प्रतिदिन अर्थ सहित वाचन जो कि मुनिश्री बहुत ही सरल शब्दों में व सरल उदाहरणों के द्वारा समझाते हैं। जो जीवन को उन्नत बनाने में कार्यकारी सिद्ध होता है।
इसके उपरांतआहार चर्या व शिविरार्थियों का भोजन,विश्राम
दोपहर का सत्र 1:30 बजे प्रारंभ होता है क्षुल्लक जी महाराज के प्रवचन एवं दोपहर 3 बजे से मुनि श्री प्रणम्य सागर जी द्वारा दस धर्मों पर बहुत अदभुत विवेचना के साथ किया जाता है। प्रतिवर्ष मुनिश्री के दस धर्मों पर बदलता हुआ गहरा चिन्तन होता है। वहा सम्मिलित होने वाले प्रत्येक शिविरार्थी को हर वर्ष दस धर्मों को अलग तरीके से समझने का सौभाग्य मिलता है।
वह बताते हैं कि इसका परिणाम यह होता है कि प्रत्येक शिविरार्थी मे धर्म की उर्जा का अदभुत संचार होता है।
एवं शिविर के पश्चात भी यह उर्जा धर्म-ध्यान करने के लिए पुरे वर्ष बनी रहती है। संध्या का सत्र अंतिम सत्र के रूप में होता है। जो की शाम 5:30 प्रारंभ होता है मुनि श्री के द्वारा प्रश्न पूछना स्वाध्याय (शंकासमाधान) उसके बाद ब्रह्मचारी भैया जी द्वारा श्रावक दार्शनिक प्रतिक्रमण कराया जाता है। एवं प्रतिक्रमण करने के साथ-साथ शुभम भैया संगीतकार द्वारा भक्ति करते हुए वर्धमान स्तोत्र का पाठ कराया जाता है जो हम सभी को भक्ति से ओत प्रोत कर देता है। यही क्रम प्रति दिन 10 दिन तक चलता है इन 10 दिनों में हम जीवन जीने की कला को सीख लेते हैं और आत्म कल्याण के मार्ग की ओर बढ़ने का मार्ग सीख पाते हैं। साधना क्या होती है साधना के शिखर पर किस तरह आगे बढ़ा जाता है यह हम शिविर में समझ पाए। वह कहते हैं कि पूरे वर्ष में यह क्षण मेरे जीवन के पूरे वर्ष के सबसे अमूल्य क्षण होते हैं। और मेरा मन यह भाव प्रकट करने लगता है।
गुरु की छाया में शरण जो पा गया
उसके जीवन में शुभ मंगल आ गया
गुरु की छाया में शरण जो पा गया। हमको क्या उनको हमारा ध्यान है। गुरु ही खेवन हार है।बेड़ा पार है जग उद्धार है। गुरु की छाया में शरण जो पा गया उसके जीवन में शुभ मंगल आ गया।
*गुरुदिट्ठीए सेयं गुरुआसीच्छाया कप्परुकँखोव्व।*
*गुरुवयणं भमहरणं सग्गसुहं गुरुपुच्छिदो हं।।*
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
