आत्मा में रमणकरना ब्रह्मचर्य है आचार्य श्री वर्धमान सागर जी
पारसोला दशलक्षण पर्व के अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य दिवस पर आचार्य श्री ने अपने धर्म देशना में बताया कि ब्रह्मचर्य अर्थात अपनी आत्मा में रमन करना ब्रह्मचर्य से आशय केवल एक इन्द्रिय पर संयम नहीं वरन पांचो इंद्रीय के जो 28 विषय हैं उसका संयम करना
चाहिए। ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करने वाले अनेक उदाहरण आचार्य श्री ने प्रवचन में कुछ उदाहरण बताए इसलिए छोटे-छोटे नियम लेकर जीवन के परिणाम शांत करें ।ब्रह्मचर्य आत्मा में रमन करने को कहते हैं।महासती महापुरुषों तीर्थंकरों ने जीवन को ब्रह्मचर्य से सार्थक किया है ब्रह्मचर्य व्रत अमृत समान है इसलिए 28 प्रकार के विषयों को सीमित करें पर्व में परिणाम निर्मल रखकर 10 धर्म का पालन करें क्योंकि यह आत्मा का धर्म है यह मंगल देशना पारसोला की धर्म सभा में आचार्य शिरोमणि श्री वर्धमान सागर जी ने प्रगट की। ब्रह्मचारी गज्जू भैया एवं





राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने प्रवचन में आगे बताया कि क्या है ब्रह्मचर्य ? आचार्य कहते हैं अपनी शुद्ध बुद्ध आत्मा में शरीर आदि पर द्रव्य का त्याग करने वाले साधु की निर्बाध परिणीति को ब्रह्मचर्य कहते हैं ।ब्रह्मचर्य व्रत को जो निरंतर पालते हैं वह परम आनंद को उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार ब्रह्मचर्य का
अर्थ है ब्रह्म संबंधी आचरण। दशलक्षण धर्म के अंतिम पड़ाव पर ब्रह्मचर्य का कथन है। ब्रह्मचर्य उत्तम देवता है पुण्य बढ़ाने वाला है नर्क के द्वार को बंद करने के लिए अत्यंत मजबूत बेड़ा है। तीर्थंकर परम देव भी इसकी सेवा करते हैं इन्द्र सहित समस्त देवगण इसकी पूजा करते हैं यह अत्यंत आदर सत्कार देने वाला है ऐसे
ब्रह्मचर्य रूपी देवता की सदा आराधना करना चाहिए। दशलक्षण पर्व पर धर्म की वर्षा हो रही है। धर्म के शिखर पर ध्वजा लगाना है।ब्रह्मचर्य व्रत का दिन है । संसारी प्राणी दिनभर अनेक भव में परिभ्रमण करते हैं किंतु थकान नहीं होती किंतु दशलक्षण के 10 दिनों में आप थक जाते हैं संसारी प्राणी जो सिद्ध भगवान बने हैं उन्होंने अपनी आत्मा में डुबकी लगाई है। नदी तालाब आदि में कपड़े उतार कर स्नान करते हैं उसी प्रकार आत्मा में भी स्नान रमन करने के लिए आपको लोभ कषाय इंद्रीय शमन करना होगा कषायो को दूर करेंगे तभी आप आत्मा में तल्लीन रह सकते हैं। 24 तीर्थंकरों में पांच तीर्थंकर बाल ब्रह्मचारी रहे हैं संसार भ्रमण में आत्मा में विभव परिणति के कारण दुख पा रहे हो जिन्होंने आत्मा में लीन होकर डुबकी लगाई वह सिद्ध अवश्य बने हैं ।आत्मा में परमात्मा बनने और सिद्ध बनने की शक्ति है। आत्मा में निवास करना ब्रह्मचर्य है। कुंथलगिरी में कुल भूषण और देशभूषण महामुनिराज की प्रतिमा है वहां से वह निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। पर्व में चार कषाय और पांच इंद्रियों का नियंत्रण ही ब्रह्मचर्य है आचार्य शांति सागर जी महाराज बाल ब्रह्मचारी थे।उनकी पट्ट परंपरा के सभी आचार्य श्री वीर सागर जी ,आचार्य श्री शिवसागर जी आचार्य श्री धर्मसागर जी आचार्य श्री अजित सागर जी और आचार्य श्री भी बाल ब्रह्मचारी रहे हैं।सभी समाज जन को अभिषेक पूजन स्वाध्याय कर मनुष्य जीवन सार्थक करना चाहिए पुण्य के फल से भौतिक सामग्री तथा आध्यात्मिक धर्म मिलता है इसलिए आत्मा का घात करने वाली कषाय का त्याग करना चाहिए । पर्व जीवन के निर्माण के लिए आते हैं पर्व से परिणाम निर्मल बनाए जाते हैं शांतिपूर्वक आनंद से पर्व मनाने से विशेष पुण्य मिलता है तपस्यियो के बारे में चर्चा कर बताया कि कोई 32 कोई 16 कोई 10 उपवास कर रहे हैं तपस्वियों के जीवन में परिवर्तन छोटे-छोटे नियम से आना चाहिए तभी आपकी तपस्या सार्थक होगी। बाल ब्रह्मचारी तीर्थंकर श्री वासु पूज्य भगवान का निर्वाण लाडू आचार्य संघ सानिध्य में चढ़ाया गया। आचार्य संघ के सानिध्य में 66 तपस्वियों द्वारा 10 दिन की व्रत उपवास तथा 85 तपस्वियों द्वारा अनंत व्रत की साधना आचार्य संघ सानिध्य में की गयी है।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
