2013 से प्रतिवर्ष सुगंध दशमी पर श्रावक संस्कार शिविर में होने वाली आरती प्रतिवर्ष एक नया कीर्तिमान लिख रही

धर्म

2013 से प्रतिवर्ष सुगंध दशमी पर श्रावक संस्कार शिविर में होने वाली आरती प्रतिवर्ष एक नया कीर्तिमान लिख रही
सागर
वर्ष 2013 के श्रावक संस्कार शिविर से सुगंध दशमी पर हजारों दीपों से आरती होने का क्रम पूज्य मुनि श्री सुधा सागर महाराज के सानिध्य में होना शुरू हुआ था। जो प्रतिवर्ष एक नया कीर्तिमान लिखती जा रही है इस वर्ष भी भाग्योदय तीर्थ पर एक इतिहास लिखा गया। जब संध्या की बेला में हजारों दीपकों से मंगल आरती की गई तो टिमटिमाते दीपक एक बल्ब के समान रोशनी दे रहे थे जो एक नया प्रकाशमान दे रहे थे और एक नई ऊर्जा का संचार कर रहे थे। मानव सारा वातावरण उजियारा हो गया हो और एक नया सकारात्मक संदेश दे रहा हो। यह दीपक की ज्योति प्यारी अंधियारा दूर भगाएगी ठीक वैसा ही आलम देखने को मिला। विनोद भैया की स्वर लहरिया वातावरण को मंत्र मुग्ध कर रही थी। नहीं छोटे से बालक ने भी मंगल आरती में अपने भजनों से सभी को भक्ति से ओत प्रोत कर दिया। मौजूद सभी शिविर में भाग लेने वाले शिविरार्थी अपने आप को भक्ति में झूमने से नही रोक पाए। अनेकों की संख्या में इसे लोगों ने टीवी चैनलों के माध्यम से देखा। सभी का मन ऊर्जा से भरा हुआ था। एक छोटे से दीपक का उजियारा प्रकाशमान कर सकता है यह दीपक की रोशनी यही संदेश जा रही थी कि तम घना अंधकार मिटाने के लिए लाइट बल्ब के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है एक छोटी सी टिमटिमाती लो की दीपक की ज्योति जीवन को प्रकाशमान करते हुए एक नव ऊर्जा का संचार कर देती है जिसका सार्थक परिणाम हमने आज देखा। निश्चित रूप से पूर्ण अनुशासन के साथ आरती का यह क्रम सभी को अपनी ओर खींच रहा था। निश्चित रूप से यह अपने आप में एक कीर्तिमान कहा जाएगा यह पूज्य गुरुदेव सुधा सागर महाराज का आशीर्वाद ही कहा जाएगा एवम उनकी चरण सन्निधि का प्रताप
उत्तम संयम धर्म पर प्रातः कालीन बेला में मंगल प्रवचन देते हुए महाराज श्री ने कहा कि सत्य को भीड़ की जरूरत नही रहती सत्य अकेला ही रहता है।

उन्होंने कहा दूसरे को कठपुतली मत बनाना दूसरे को अंड़र में मत रखना, बस इतना सा नियम और ले ले तो सत्य के बाद संयम पर कलशारोहण हो जाएगा, वही सत्य-सत्यधर्म बन जायेगा। लोग कहते हैं कि ऐसा नियम बताओ कि मुझे किसी की नौकरी न करना पड़े, हो जाएगा तुम्हें एक नियम लेना पड़ेगा- प्रतिदिन ये भावना भानी पड़ेगी कि ‘कभी मुझे अपने कार्य के लिए किसी को नौकरी न कराना पड़े, हम किसी को दास न बनाये।’

 

 

 

 

बड़े आदमी क्यों दुर्गति जाते हैं क्योंकि वह सारी दुनिया को अपना दास बनाना चाहते हैं। जब तुम्हें गुलामियत पसंद नहीं है तो दूसरे को क्यों? कोई महिला नहीं चाहती कि वह दूसरे के जूठे बर्तन मांझे, यह वरदान तुम्हें मिल जाएगा, कभी कोई तुम्हारे झूठे बर्तन मांजे तो एक ही भाव करना, जब मैं किसी के जूठे बर्तन नहीं मांजना चाहती तो ये भी तो जीव है, किसी की माँ, किसी की पत्नी है। हे भगवान दो दशा में से एक वरदान पूरा कर दे- ‘मुझे ऐसी दशा में पहुंचा दे कि मुझे बर्तन जूठा करना ही न पड़े, यानी भूख से ऊपर उठा दे या फिर इसको इतना समर्थ बना दे कि दूसरे के जूठन बनकर रोटी ही ना कामना पड़े।’

तुम सोच रहे हो कि मुझे कभी किसी दूसरे के यहाँ नौकरी न करना पड़े, कभी सोचना कि संसार मे किसी को नौकरी न करना पड़े। जब व्यक्ति को यह पता चल जाता है कि मेरे पास सब कुछ है तो वह किसी की परवाह नहीं करते, सिद्ध भगवान भी ऐसे ही है। सत्य व्यक्ति को निर्भीक बनाता है, मुझे किसी की जरूरत नहीं, मैं किसी से डरने वाला नहीं क्योंकि मेरे पास सत्य है, ये सत्य जो है विनाश कर सकता है, तब संयम कहता है कि तुम शक्तिमान हो तो दुनिया शक्तिहीन नहीं है, वो भी शक्तिमान है। तुम्हारा स्वाभिमान है तो सामने वाले का भी स्वाभिमान है। मैं जीना चाहता हूँ तो दुनिया भी जीना चाहती है बस इतना सा नियम ले लो।

 

 

 

एक हिंसक जानवर भी जीना चाहता है, एक मांसाहारी भी जीना चाहता है, हर व्यक्ति जीना चाहते है। यदि तुम जीने का वरदान चाहते हो तो महावीर स्वामी ने कहा तुम्हें एक नियम और लेना पड़ेगा दुनिया को जीने दो। यही भूल अपनी हो रही है कि अपन स्वयं आजाद रहना चाहते हैं, दूसरों को आजादी नहीं देना चाहते? जो दूसरों को नहीं बचा सकता, एक दिन उसे मरना पड़ेगा। अमर बनने के लिए सबसे पहले तुम्हे निरन्तर ये बनना पड़ेगा संसार में मेरे द्वारा किसी जीव की हत्या न हो। इन्द्रिय संयम उस दिन होगा जिस दिन तुम्हें अपने खुद के मन पर गर्व होगा और तुम्हारे मन पर दुनिया गर्व करेगी।

 

 

 

तुम बुरे हो तो इंद्रियाँ बुरी है, तुम अच्छे हो जाओगे तो तुम्हारी इंद्रियाँ भी अच्छी हो जाएगी। जिनको बीजाक्षरों का मंत्र बनाना आ गया, उसे संसार की कोई गाली नहीं लगती, उस गाली में भी दिखता है मंत्र। किसी ने मूर्ख कहा तो कर्ण इन्द्रिय का संयम वाला व्यक्ति कहता है- इसने गाली नही, मंत्र दिया है- म, उ, र, ख। ये बीजाक्षर है। सत्य है कि उसने मूर्ख कहा है लेकिन कर्ण इन्द्रिय का चमत्कार कहता है- म, उ, र, ख कहा है। ॐ भगवान, गुरु की सम्पत्ति है और ह्रीं हमारी खुद की संपत्ति है।

 

 

गाली सुनकर शांत हो जाने का नाम संयम है और जो शब्द सुनाया है उस शब्द को मंत्र बना देने की ताकत का नाम संयमधर्म है। नाग का हार बन जाए, जहर अमृत बन जाए तब संयम धर्म है। गाली पर गाली दी जा रही है और कान में शब्द आते ही वह सब गाली खत्म। बुरी नियत से मत बोलो, बुरा निकल भी जाएगा तो अच्छा ही होगा।
अजय जैन लांबरदार सागर से संकलित प्रवचन के। साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *