राग, क्रोध से भी बड़ा जहर है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज

धर्म

राग, क्रोध से भी बड़ा जहर है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ परिसर में पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री सुधा सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि क्रोध प्रायः चेतन पदार्थ से जागता है, मायाचारी व्यक्ति भी जीव को फंसाता है, मान भी अकड़ता है तो जीव के सामने अकड़ता है, इन तीनो कषायों में जीव की प्रधानता है, क्वचित कदाचित पुद्गल भी है लेकिन लोभ कषाय इतनी खतरनाक है जो जीव पर ही नहीं, अजीव पर भी अधिकार जमाती है।

 

 

अजीव से ज्यादा राग है, यदि जीव से राग होता तो भाई भाई धन दौलत पर लड़ते नही। उस धन-दौलत से इतना राग है कि उसके लिए आप भाई को भी निपटाने के लिए भी तैयार हो जाते है। यहाँ तक कि माँ-बाप से बड़ा राग हो जाता है कि तुम धन छुपाकर ससुराल में रख देते हो।

 

क्रोध के लिए हर माँ कहती है कि महाराज इसे समझाओ- ये बेटा बहुत क्रोध करता है तब मैं बहुत खुश होता हूँ कि कम से कम इसको अपना गुस्सा पकड़ में तो आ गया, इससे बच जाओगे। जब दूसरे को फसाने के लिए मायाचारी करता है और उसमें स्वयं फंस जाता है तो पश्चाताप करता है कि मुझे ऐसा नही करना चाहिए। मान के लिए भी लोग कहते है कि ज्यादा मत अकड़ लेकिन आज तक कोई माँ नही आई जो कहे- महाराज मेरे बेटे को समझाओ, ये मेरे से बहुत राग करता है। नही लगता बुरा और जिस दिन तुम्हे राग बुरा लगने लग जाये, या तो साधु बनने का लक्षण है या सुसाइड करने का लक्षण है।

 

 

जब पति पत्नी एक दूसरे से लड़ते हैं तो लोग कहते हैं कि लगता है ये दोनों पूर्व जन्म के बैरी है। आज वो रहस्य खोल रहा हूँ- जो एक दूसरे से इतना राग करते हैं कि एक दूसरे के बिना मर जायेंगे ये भी पूर्व जन्म के बैरी है। जब तुम दोनों को इतना राग हो रहा हो, समझ लेना कि ये पूर्व जन्म का बैरी हैं, ये मुझे मिटा के मरेगी और ये खुद मिट के मरेगी। दोनों जब राग में मरेंगे तो दोनों की दुर्गति होगी, इसलिए आज का दिन कहता है कि राग करो लेकिन इतना मत करो कि तुम दोनों एक दूसरे के बैरी बन जाओं। सबसे निकृष्ट एकेन्द्रिय स्थावर पर्याय है, एकेन्द्रियो में क्रोधी, माया, मानी नही जाता लेकिन रागी व्यक्ति मरकर नियम से एकेन्द्रियों में पैदा होता है।

 

राग, क्रोध से बड़ा जहर है। यदि तुम चाहते हो कि हमारे बेटे का हित हो, हमारा परिवार मरकर दुर्गति में न जाए, एकेन्द्रिय न बने तो बस घर मे कोई क्रोध करे तो उसकों रोकना या नही रोकना, लेकिन कोई अति राग करे तो राग को जरूर कम करना, चाहे तुम्हे दुश्मनी करना पड़े तो कर लेना। गर तुम्हारी माँ तुमसे बहुत राग करती है और तुम नहीं चाहते कि वह मरकर एकेंद्रियों में जन्म ले तो पहले तुम समझाना, नही माने तो माँ को एक ऐसा धोखा देना जिससे माँ का मन तेरे पर से उचट जाये। द्वेष भाव से नही, तुमने माँ को एकेन्द्रिय बनने से बचाया है। आज के दिन जिन जिनको, जो जो लोग चाहते है उनमें खटान पैदा करो, ज्यादा मीठे में कीड़े पड़ जाते है।

 

द्वेष से भी खतरनाक होता है राग का बैर, जब तुम्हारे घर में कोई जवानी में मर जाए तो तुम्हे कितना दुख होता है, मैंने कहा मत रो, यह पूर्व जन्म का बैरी था जो तुम्हें इतना राग पैदा करके मर गया, तड़फा गया जिंदगी के लिए। पत्नी के मररते समय तुम एक बात कहना- मैं तुम्हारा पति नहीं, तू मेरी पत्नी नहीं। यदि तुम सच्ची माँ को चाहते हो तो मरते समय कहना मैं तेरा बेटा नहीं, तू मेरी माँ नहीं। तू अकेले आई थी, अकेले ही जा रही है, इसलिए कोई तुम्हे बहुत चाह रहा है तो उसके राग को कम कर देना। राग को कम करना का सूत्र है- अनित्य भावना।

 

जब भी तुम्हें कोई व्यक्ति गलत मार्ग पर जाने को सलाह देवे समझ लेना वो पूर्व भव का बैरी है जो तुम्हारा मित्र बनकर आया है। दो व्यक्ति लड़ रहे हो और समझौते के स्थान पर गलत सलाह दे रहा है समझ लेना यह बैरी है। जब तुम्हारी माँ ससुराल भेजें और कहे-बेटी एक भी बात मत सुनना सासु की, वो एक सुनाये, तू चार सुनाना, समझ लेना यह माँ नहीं है, पूर्व भव की बैरन है जो तुम्हारे लिए उल्टा उपदेश दे रही है, वो तुम्हारे ससुराल को नरक बना देगी और माँ होगी तो कहेगी-मेरे से भी ज्यादा प्यार तू सासु से करगा ‼️
अजय जैन लांबरदार से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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