जो परम मुनि इच्छाओं को रोककर और वैराग्य रूप विचारधारा से युक्त होकर आचरण करता है उसको शौच धर्म होता है। प्रज्ञासागर महाराज
झालरापाटन।
दिगंबर जैन समाज के 10 लक्षण पर्व के चौथे दिन बुधवार को उत्तम शौच धर्म को अंगीकार कर विशेष पूजा अर्चना की गई। दिगंबर जैन समाज के सभी मंदिरों में सुबह से ही शांति धारा व अभिषेक के साथ नित्य नियम और 10 लक्षण की पूजन हुई। शांतिनाथ बाड़ा में तपोभूमि प्रणेता एवं पर्यावरण संरक्षक आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज के सानिध्य में विधानाचार्य राजकुमार जैन बैंक वाला ने संगीतकार कटनी निवासी पदमचंद जैन के मधुर स्वर लहरियों के साथ विधान की पूजन करवाई। जिसमें सोधर्म इंद्र ऋषभ चंद अनीता, अर्पण, भीनी सेवालय परिवार भवानी मंडी के साथ अन्य पुरुष एवं महिलाओं ने पूजन की। प्रवक्ता यशोवर्धन बाकलीवाल ने बताया कि दोपहर 2:30 बजे शांतिनाथ मंदिर में हेमश्री माताजी के सानिध्य में तत्वार्थ सूत्र, शाम 6:30 शांतिनाथ बाड़ा मे प्रतिक्रमण और 7 बजे से आनंद यात्रा हुई। इसके पश्चात श्रावको ने आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज की आरती की।
10 लक्षण पर्व के दौरान धर्म सभा में आचार्य प्रज्ञा सागर महाराज ने कहा कि जो परम मुनि इच्छाओं को रोककर और वैराग्य रूप विचारधारा से युक्त होकर आचरण करता है उसको शौच धर्म होता है। आचार्य ने उदाहरण देते हुए बताया कि जब मैं बैठा था वह समय सामायिक का था और एक मक्खी अचानक सामने देखने में आई। उसके पंख थोड़े गीले से लग रहे थे।
वह उड़ना चाहती थी पर उसके पंख सहयोग नहीं दे रहे थे। वह अपने शरीर पर भार अनुभव कर रही थी और उस भार के कारण उड़ने की क्षमता होते हुए भी वह उड़ नहीं पा रही थी। जब कुछ
समय के उपरांत पंख सूख गए तब वह उड़ गई। मैं सोचता रहा कि वायुयान की रफ्तार जैसी उड़ने की पूरी की पूरी शक्ति ही मानो समाप्त हो गई। थोड़ी देर के लिए उसे हिलना डुलना भी मुश्किल हो गया। यही दशा संसारी प्राणी की है।
संसारी प्राणी ने अपने ऊपर अनावश्यक न जाने कितना भार लाद रखा है और फिर भी आकाश की ऊंचाइयां छूना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति ऊपर उठने की उम्मीद लेकर नीचे बैठा है। स्वर्ग की बात सोच रहा है लेकिन अपने ऊपर लदे बोझ की ओर नहीं देखता जो उसे ऊपर उठने में बाधक साबित हो रहा है। वह यह नहीं सोच पता कि क्या मैं यह बोझ उठाकर कही ले जा पाऊंगा या नहीं। वह तो अपनी मानसिक कल्पनाओं को साकार रूप देने के प्रयास में मन वचन और काय की चेष्टाओ में लगा रहता है।





अमूर्त स्वभाव वाला होकर भी वह मूर्त सा व्यवहार करता है। यूं कहना चाहिए कि अपने स्वरूप को भूलकर स्वयं भारमय बनकर उड़ने में असमर्थ हो रहा है। ऐसी दशा में वह मात्र लुढ़क सकता है, गिर सकता है और देखा जाए तो निरंतर गिरता ही आ रहा है। उसकी ऊंचाई की ओर बढ़ना तो दूर रहा देखने का साहस भी खो रहा है। जैसे जब हम अपने कंधों पर या सिर पर भार लिए हुए चलते हैं तो केवल नीचे की ओर दृष्टि जाती है। सामने भी ठीक से नहीं देख पाते हैं। आसमान की तरफ देखने की तो बात ही नहीं है। ऐसे ही है संसारी प्राणी के लिए मोह का बोझा। मोह उसके सिर पर इतना लदा है , कहो कि उसने लाद रखा है कि मोक्ष की बात करना ही मुश्किल हो गया है। विचित्रता तो यह है की इतना बोझ कंधों पर होने के बाद भी वह एक लंबी सांस लेकर कुछ आराम जैसा अनुभव करने लगता है और अपने बोझ को पूरी तरह नीचे रखने की भावना तक नहीं करता। बल्कि उसे बोझ को लेकर ही उससे मुक्त हुए बिना मोक्ष तक पहुंचने की कल्पना करता है।
नालिन जैन लुहाड़िया से प्राप्त जानकारी
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
