दिगंबर मुद्रा देख लो…त्याग करना सीख लो पर्वाधिराज पर्युषण पर्व
पर्युषण शब्द का अर्थ है चारों तरफ धर्ममय वातावरण।
पर्युषण पर्व 10 दिन तक 10 अलग-अलग धर्म की विशेषता का पर्व है। उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच (शुचिता/पवित्रता), संयम, तप, त्याग, अकिंचन, ब्रह्मचर्य।
दिगंबर जैन मुनि निश्चित ही ब्रह्मांड में त्याग की सबसे बड़ी प्रतिमूर्ति है।हम दिनभर कुछ ना कुछ खाते रहते हैं हमारी इंद्रियों को हम संयम में नहीं रख सकते। एक जानवर भी रात्रि में अपनी जुगाली करना बंद कर देता है किंतु मनुष्य सुबह उठने से अपनी रसना इंद्रिय के वशीभूत होकर उसकी इच्छा पूर्ति में लगा रहता है बल्कि मध्य रात्रि में भी नियंत्रण नहीं रख सकता।






आज एक ऐसे समाधिस्थ संत का सुक्ष्म जीवन परिचय देते है जो मात्र एक जैन संत नही बल्कि जन जन के संत थे। संत शिरोमणि आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज।
आप सोचिये वो आहार मे क्या लेते होंगे। लगभग हर वस्तु का त्याग था। हरी का त्याग का मअर्थात हर वह सब्जी फल जो अंदर से गीले/सजीव है। जिनको यदि पेड़ से ना तोड़ा जाए तो बढ़ने को क्षमता है। जैसे- लोकी, टमाटर, गिलकी, हरी मिर्च, तरबूज, अनार, सेव, पपीता, केला इत्यादि (दाले एवम सूखे मेवे सजीव नही होते)
आचार्य श्री के आजीवन मीठे का त्याग, नमक का त्याग था। सिर्फ उबली दाल चपाती लेते थे। स्वाद हीन भोजन ग्रहण करते थे। और यदि भोजन में स्वाद भी आ जाए तो तो पानी मिलाकर स्वादहीन बना लेते है। क्यू कि स्वादिष्ट भोजन तो रसना इंद्रिय का विषय है। काया को तो मात्र साधना करने के लिए जीवित रखना होता है।
हर जैन साधु सिर्फ मर्यादित वस्तु खाते है। पानी से बनी कोई भी भोजन/खाद्य वस्तु हो, कल भी बनी वस्तु (बासी) के भी त्याग होते है।
हर दिगंबर साधु आहार में गर्म पानी क्यू ही सेवन करते है वह भी, सिर्फ भोजन के समय जो कि 24 घंटे मे सिर्फ एक बार, वह भी एक आसन पर। जिसमे आचार्य श्री तो समस्त आहार मिलाकर मात्र 48 अंजुली आहार जल लेते थे।
हर साधु अंतराय कर्म का पालन करते है। यदि भोजन में बाल, कचरा, चींटी आदि जीव आ जाए, कोई अधिक शोर, अर्थी निकलती हुई दिखे तो अंतराय कर लेते है। फिर हलक के अंदर का अंदर एवम हलक से बाहर का बाहर निकाल देते है। जल की एक बूंद भी नही ग्रहण करते, अगले आहार तक।
चूंकि आजीवन पैदल चलते है तो अंतराय होने पर भी विहार करते है और तनिक मात्र विचलित नहीं होते। एक दिन में 20 से 40 किमी पैदल विहार करते है।
वस्त्र त्याग: जहा सर्दी में हम बनियान, इनर, कपड़े फिर ऊनी वस्त्र पहनते है वहा एक दिगंबर साधु कितनी ही कड़कड़ाती ठंड हो तन पर एक धागा मात्र कपड़ा नहीं औढ़ते, आजीवन लकड़ी के पाट अथवा जमीन पर सोते है। लकड़ी की चटाई ही औढ़ते है।
आचार्य श्री के तो आजीवन चटाई के भी त्याग थे।
केशलोचन: हर दिगंबर साधु अपने हाथो से ही सिर और दाढी-मूछो के बाल तोडते है। और उस दिन का उपवास रखते है। कभी /कैची औजारों से कटिंग नही करवाते। हमारे कभी बाल तोड़ने पर बाल तोड़ हो जाता हैं जिसकी पीड़ा असहनीय होती है। वो सहज ही सहन कर लेते है। क्यू कि वह दर्द शरीर को होता है। आत्म को नही।
अहिंसाणुव्रत/आजीवन पैदल विहार: हम गर्मी में जहा बिना चप्पल के जहा एक कदम नहीं बढ़ा पाते वहा वह आजीवन पैदल चलते है। काटो भरी राह हो या कंकड चाहे पत्थर, वाहन मे बैठना तो दूर। कभी चप्पल जूते नही पहनते। प्रत्यक्ष रूप से हिंसा (चींटी इत्यादि जीवों को मारना) भाव हिंसा भी नही करते (मन मे भी किसी को मारने का भाव तक नही लाते।) आचार्य श्री के तो दिनभर थूकने एवं सूर्यास्त पश्चात लघु शंका तक का भी त्याग था। जिससे कि धरती पर विचरण करने वाले सूक्ष्म जीव अंधेरे मे कहीं मर ना जाये।
एक फूटी कौड़ी साथ नही रखते। सिर्फ एक कमंडल (जिसमे शुद्धि के लिए जल) और एक मयूर पिच्छिका (मयूर पंख सबसे कोमल होता है। जिससे मार्ग मे आए चींटी इत्यादि सूक्ष्म जीवों को हटाते है। क्योकि मयूर पंख के स्पर्श से जीव नही मरते) को साथ रखते है।अपने साथ सुरक्षा हेतु कोई हथियार/पैसा इत्यादि नही।
इनकी महानता का बखान करना सूरज को दीपक दिखाने जितना है। शायद ही पृथ्वी पर इतने त्याग करने वाला कोई मनुष्य/साधु होगा। किसी क्षेत्र या मठ नही बनाते। एक स्थान पर कभी अधिक नही रहते। आगे चलते रहते है। क्यू के रमता जोगी, बहता पानी।
आपके आशीर्वाद से भारतवर्ष में आज हजारों गौशलाए जैन समाज द्वारा संचालित हो रही है।
आपका एक स्वप्न था “इंडिया नहीं भारत बोलो” इसके प्रणेता आप ही हो। मोहन जी भागवत ने आपकी प्रेरणा से ही सरकार में देश का नाम भारत करने का प्रस्ताव रखा।
आप हानिकारक रसायन रहित, स्वदेशी “हथकरघा (वस्त्रों को) अपनाओ” की प्रेरणा दे रहे है। आपके के द्वारा देश के सेकडो बंदीगृहो में हथकरघा केंद्र संचालित है। जिससे कई बंदियों को स्व रोजगार मिल रहा है। और वह अपराधिक प्रवृत्ति छोड़ रहे है।
आपने “मातृभाषा हिंदी अपनाओ” पर जोर दिया है। और कहा कि आपकी मातृभाषा जिसमे आप स्वप्न देखते हो। तो लिखने एवम् बोलने में लज्जा कैसी। जिससे लाखो व्यक्तियो ने हिंदी का प्रयोग बढ़ाया है।
देश में आपके आशीर्वाद से कई “प्रतिभास्थली” संचालित है। जिसमे बालिकाओं को संस्कार एवम् शिक्षा प्रदान की जाती है। यहां से उत्तीर्ण छात्राएं देशभर में नाम रोशन कर रही है।
आपके द्वारा रचित महाकाव्य “मूकमाटी” कई भाषाओं में अनुवाद किया जाता है। एवम् देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में उस पर PhD में शोध किया जा रहा है।
आप की प्रेरणा “शाकाहार अपनाओ” से देश में कई राज्यों में विद्यालय में मांसाहार परोसने पर रोक लगी है। जिससे कि कई जीवो को अभयदान मिला है।
कोई भी जैन साधु आजीवन कूलर, पंखे, AC, गाड़ी मोटर इत्यादि भौतिक परिग्रहो के आजीवन त्याग होते है।
यदि जैन साधु के कल का उपवास है तो इसका अर्थ हुआ में आज एक आसान पर कुछ भी लेने के पश्चात 48 घंटे बाद ही अन्न जल लेंगे। इसके बीच पैदल विहार भी करेंगे। प्रवचन भी करेंगे।
हर जैन साधु मात्र 4 घंटे की नींद लेते है। प्रात: 4 बजे उठकर प्रतिक्रमण करते है। और दिन में 3 बार स्वाध्याय करते है।
खानपुर के स्थानीय योगेश जैन के अनुसार वर्तमान में चांदखेड़ी अतिशय क्षेत्र पर आचार्य श्री विद्यासागर जी से दीक्षित साधु मुनि श्री शाश्वत सागर जी महाराज विराजमान है तो 2 उपवास एक आहार की साधना कर रहे है। अर्थात 36 घंटे में एक बार अन्न जल लेते है।
आचार्य श्री की प्रेरणा से चांदखेड़ी में एक संस्था जो वर्ष 2016 से जीवदया क्षेत्र में कार्य करे रही है। हर निराश्रित घायल जीव का उपचार करवाना, एवम गौवंश को सुरक्षित आश्रय दिलवाना। और संस्था द्वारा हाल ही में जन सहयोग से खानपुर में एक पक्षी घर टावर का निर्माण किया गया है।
संकलन: योगेश कुमार जैन, जीवदया हेल्पलाइन खानपुर
