भाग्यवान ही मृत्यु को महोत्सव बनाते हैं- धर्मतीर्थ क्षेत्र में पँचकल्याणक के बाद आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी गुरुदेव के निर्यापकत्व में तीसरी दीक्षा और चौथी समाधि संपन्न हुई आडूल गौरव आर्यिकाश्री आराध्य मती माताजी की मातोश्रीसौ.सुगंधा चाँदमल जी कासलीवाल बनी आर्यिकाश्री मुक्तिश्री माताजी

धर्म

भाग्यवान ही मृत्यु को महोत्सव बनाते हैं- धर्मतीर्थ क्षेत्र में पँचकल्याणक के बाद आचार्य श्री गुप्तिनंदी जी गुरुदेव के निर्यापकत्व में तीसरी दीक्षा और चौथी समाधि संपन्न हुई आडूल गौरव आर्यिकाश्री आराध्य मती माताजी की मातोश्रीसौ.सुगंधा चाँदमल जी कासलीवाल बनी आर्यिकाश्री मुक्तिश्री माताजी*

 

धर्मतीर्थ
आचार्य श्री गुप्तिनन्दी जी ने कहा मृत्यु को मातम नहीं महोत्सव बनाओ। सारे संसार में सभी धर्मों में जीने की कला सिखाई जाती है लेकिन जैन धर्म जीने के साथ-साथ मृत्यु को अमर बनाने की कला सिखाता है।जो एक बार समाधि मरण करता है वो श्रेष्ठ समाधि मरण करने वाला जघन्य रूप में 7-8 भव और उत्कृष्ट रूप में 2-3 भव में तीर्थंकर चक्रवर्ती आदि उत्तम पदों को प्राप्त करते हैं बाद में अंतिम निर्वाण, अरिहंत सिद्ध पद को प्राप्त करते हैं। श्रद्धांजलि सभा में मंच संचालन ब्र.पूजा दीदी ने किया उन्होंने कहा यह धर्मतीर्थ क्षेत्र हम सभी के लिए दीक्षा शिक्षा समाधि साधना करने का, आत्मकल्याण का सर्वश्रेष्ठ स्थान बन गया है।

 

 

 

मंगलाचरण गणिनी आर्यिकाश्री आस्थाश्री माताजी ने किया।श्रद्धांजलि सभा के पहले श्री चाँदमल सुभाष प्रशांत कासलीवाल परिवार की ओर से धर्मतीर्थ साम्राज्य नायक श्री शान्तिनाथ भगवान का महामस्तकाभिषेक, महाशान्तिधारा, सोलह कारण व शान्तिनाथविधान किया गया। राजकुमार काला, अभय कासलीवाल,आदि अनेकों गणमान्य व्यक्तियों द्वारा माताजी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।। गणिनी आर्यिकाश्री आस्थाश्री

 

 

माताजी ने कहा- धर्मतीर्थ आपका उद्धार करने के लिए सदैव तत्पर है।जिन्हें भी अपना कल्याण करना है।जीवन का अन्त सुधारना है।वे सहर्ष आचार्य श्री की शरण में आईये।पहले से ही अपनी दीक्षा और समाधि की भावना डायरी में लिख देना जिससे समय रहते आपका परिवार आपको गुरू शरण में ले जायेगा और आपका भविष्य उज्जवल करेगा।
क्षुल्लक श्री शान्ति गुप्त जी ने कहा-जहाँ संसारिक जीवोँ की सोच खतम हो जाती है वहाँ से हमारे आचार्यों गुरुओँ की सोच आरंभ होती है। जहाँ चिकित्सा विज्ञान की सेवाएं समाप्त हो जाती है वहाँ आध्यात्मिक जैन विज्ञान मृत्यु को महोत्सव बनाकर जीवन को अमरता के मार्ग पर लगा देता है।11-9-1955 सुगंध दशमी को जन्मी सौ.सुगंधा चाँदमल कासलीवाल 2प्रतिमा के व्रत पालन किये।2000से अधिक उपवास किये और जीवन के

 

 

अंतिम क्षणों में अपने भरे पूरे घर परिवार और सभी सुविधाओं का त्याग कर धर्मतीर्थ क्षेत्र में विराजमान निर्यापक आचार्य श्री गुप्तिनन्दी जी से आर्यिका दीक्षा ग्रहण की ओर वे आर्यिकाश्री मुक्ति श्री माताजी बनी। अंत में आचार्य श्री संघ से णमोकार मंत्र सुनते हुए नश्वर शरीर को छोड़कर उत्तम समाधि मरण किया।

 

 

श्रद्धांजलि सभा में श्री चाँदमल सुभाष प्रशांत कासलीवाल खानदान के सभी सदस्य, बांधव रिश्तेदार के साथ आडूल छत्रपति संभाजीनगर सहित मराठवाड़ा परिसर के और दूर दराज के हजारों भक्त उमड पडे। धर्मतीर्थ के अलौकिक विकास की सभी ने सराहना की।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट9929747312

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