गुणहीन व्यक्ति यदि गुणवानों से प्रशंसा सुनकर आनंदित होता है तो वह लूला लंगड़ा, अंधा और बहरा होता है : निर्यापक श्रमण मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज
सागर
भाग्योदय तीर्थ पर अपने मंगल प्रवचन देते हुए निर्यापक श्रमण सुधा सागर जी ने कहा की हम पुण्यात्मा
है हम शक्तिमान है, हम साधु है, हम भगवान है, जितना अपने आप को ऊंचा उठा सको उठाओ क्योंकि हमने आपसे कहा था कि तुम अपने आप को जितना नीचे गिरा सको गिराओ, जितना अपने आपको पुण्यहीन कह सकों अनुभूति में, शब्दों में नही तो शायद तुम्हे ये मंजूर नही। कोई व्यक्ति अपने आप को पापी, पुण्यहीन को तैयार नहीं होता। चलो कोई बात नहीं हम दूसरी तरीके से आते हैं। तुम अपने आप को सबसे बड़ा मान लो, भगवान मान लो या जो तुम्हें अच्छा लगे वह मान लो लेकिन जानों बड़े का अर्थ क्या होता है?
महाराज श्री ने कहा तुम महाराज के लिए जितने ऊँचे शब्द बोलते हो, यही तुम्हारी भक्ति है, इसमे निधत्त निकाचित पुण्य का बंध होता है, जितने गुण भगवान गुरु में हो, उतने ही गुण बोलने में सामान्य पुण्य का बंध होता है क्योंकि जो है वह तुम बोल रहे हो और जो तुम यह बोल रहे हो कि मैं गुरु का नहीं, साक्षात् भगवान का, चलते फिरते सिद्धों का दर्शन कर रहा हूँ, ये भाव जब तुम्हें आता है उस समय निधत्त निकाचित पुण्य का बंध होता है, ऐसे पुण्य का बंध होता है कि कितने ही पाप कर्म के विपरीत वातावरण आ जाए, तुम्हारा बाल बांका नहीं होगा।
पूज्य समन्तभद्र महाराज ने कहा जिसको तू नमोस्तु कर रहा है, जिसका तू नाम ले रहा है उनको जितनी तेरी ताकत हो, जितना अपने आराध्य को उठा सके तो उतना ही निधत्त निकाचित पुण्य का बंध होगा। जैसा दुनिया कह रही है, वैसा मैं हूँ, ऐसा साधु ने मान लिया तो बस यहाँ से हमारा बंटाधार हो जाएगा और उसमें भी आनंद की अनुभूति आ गई तो सीधा साधु नही, मिथ्यादृष्टि हो जाऊँगा, इसलिए भक्तों की प्रशंसा कभी सुनना नहीं।

उन्होंने कहा यदि फिर भी तुम्हे प्रसंशा सुनने का शौक हो तो एक बार पूज्य आचार्य श्री ने कहा था हम लोगों से कि देखों श्रावक तुम्हें क्या कह रहे है और तुम स्वयं को देखना मैं क्या हूँ? ऐसा भक्त के द्वारा की हुई प्रशंसा, स्वयं की निंदा का कारण बन जाये तो प्रशंसा सुनने का अधिकारी हो। हमारी प्रशंसा खुद की आलोचना का, पश्चाताप का कारण बन जाए तो उससे हमारी विशुद्धि और बढ़ेगी।
यह हमें आदत में डालना है, जब जब कोई प्रशंसा करें, हमें खुद की निंदा करना है, जब जब कोई हमें धर्मात्मा कहे, अपने को अधर्मी सिद्ध करना है क्योंकि मन बेईमान है, अकड़कर चलेगा तो तुरन्त कहना क्या तू ऐसा है। ऐसे ही तुम श्रावकों को किसी ने कह दिया कि तुम वस्त्रों के अंदर भी मुनि हो, ये वस्त्र तो मात्र ऊपर से अछार है। तुम्हें इसमें थोड़ा सा भी आनंद आ गया कि देखा लोग मुझे मुनि मानते हैं, महानुभाव नीच गोत्र का बन्ध होगा, वे अंधे लूले, लंगड़े और बहरे होंगे। दशा तेरी असंयम की ही है और तुम अपने आपको मुनि मानने के बाद आनंद मना रहा है तो नीच गोत्र का बंध हो रहा है। गुणहीन व्यक्ति यदि गुणवानों से प्रशंसा सुनकर आनंदित होता है तो लूला लंगड़ा, अंधा और बहरा होता है।
भिखारिन माँ अपने बेटे से कह रही है कि तू राजा बेटा है और दुनिया कह रही है कि आ गया भिखारी कही का, अब बताओ माँ सही है या दुनिया सही है, दोनों सही है क्योंकि माँ तुझमें भावी पर्याय देख रही है और जनता तुझ में वर्तमान पर्याय देख रही है। लेकिन तुम्हें वही मानना है जो तुम हो, तुम क्रोधी हो तो क्रोधी और लोभी हो तो स्वयं को लोभी मानना, पाप करते हो तो पापी बस जो तुम हो, उससे आगे मत बढ़ना। वही माँ को झूठा कहना मत और माँ ने जैसा कहा वैसा स्वयं को मनाना मत, यही बेटे का लक्षण है।
अजय जैन लांबरदार से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
