धार्मिक अनुष्ठान खूब करो लेकिन पुण्य की अपेक्षा से मत करना नियम सागर महाराज
विदिशा
धार्मिक अनुष्ठान खूब करो लेकिन पुण्य की अपेक्षा से मत करना आत्मा का ध्येय तो सिद्धत्व की प्राप्ति के लिये होंना चाहिये
उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण नियमसागर महाराज ने शीतलधाम विदिशा में व्यक्त किये। मुनिश्री ने कहा कि जिस शब्द अर्थ सहित बोध हुआ हो उसे आप अपनी स्मृति में यदि रखते है,तो कभी विस्मृत भी हो जाये तो किसी के याद दिलाने पर वह स्मरण में आ जाता है,जैसे किसी व्यक्ति को आपने 25 साल पहले देखा जब वह युवावस्था में था और आज देखा तो वह कहता है कि महाराज जी आपने पहचाना तो स्मृति की ओर ध्यान गया तो कह दिया हां पहचान गया लेकिन चहरे पर परिवर्तन आ गया बाह्य परिग्रह और भीतर का परिग्रह ज्ञान का विषय है। भगवान की पूजा अनुष्ठान तो आप खूब गदगदभाव से करते है ऐसे ही गदगदभाव से कभी अपनी आत्मा को देखने का पुरुषार्थ किया? जहा आसक्ति है वही विकल्प होते है,सुबह उठे देर हो गयी मंदिर जाने का विकल्प होगा कि नहीं? लेकिन जो व्यक्ति मंदिर ही कभी नहीं गया तो उसको यह विकल्प नहीं होगा आसक्ती भी व्यक्ति की रुचि अनुसार होती है।




जैसे आपके पास मोबाईल है और उसमें सबकुछ उसकी चिप में फीड है ऐसे ही हमारे पास तो मोबाइल है नहीं लेकिन मतिज्ञान है,और उसी मतिज्ञान के बल पर ही हम 25 साल पुरानी वस्तु को अपनी स्मृति में लाते है।
उपरोक्त जानकारी सम्यकज्ञान चातुर्मास कमेटी के मीडिया प्रभारी अविनाश जैन ने देते हुये बताया प्रतिदिन प्रवचन 8:30 से लाईव चल रहे है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
