आजकल भौतिक पदार्थ का नशा आई इतना अधिक छाया है कि सच्चे और अच्छे पदार्थ उसे दिखाई नही देते,दिख भी जाए तो उसे नही मानता है। योगसागर महाराज
रहली
सुख की चाहत तो संसार में सभी को है पर सुख पाने का लक्ष्य ज्ञात नही है और पर पदार्थ में भी सुख नही है जैसे जंगल में हिरण आओ नाभि में महकने वालीकस्तूरी को ढूंढता हुआ पूरे जंगल
में दौड़ता रहता है, इस प्रकार मनुष्य भी अपने अंदर बैठे संतुष्टि के भाव को जागृत किए बिना बाहरी पदार्थ में सुख और संतुष्टि ढूंढने का प्रयास करता है।
यह बात मुनिश्री योगसागार महाराज ने जैन धर्मशाला में प्रवचन देते हुए कही। उन्होंने कहा कि आजकल भौतिक पदार्थ का नशा इतना अधिक छाया है किसच्चे और अच्छे पदार्थ उसे दिखाई
नहीं देते। दिख भी जाए तो उसे नहीं मानता है।दर्शन है स्वाध्याय में पढ़ते हैं कि भगवान को ज्ञान के अनुभूति के कारण उन्होंने संसार को त्याग करने में शांति को प्राप्त किया है। इस प्रकार हम सबको भी अपने भीतर के जागृत विषयभोगों से स्वयं को रिक्त और मुक्तकरने के साथ भगवान की वाणीपर विश्वास रखता है।




महाराज श्री ने कहा की धर्म कहता है, स्वयं को चाहे स्वयं के कल्याण की कामना के साधन ढूंढो दूसरे के कल्याण करने का भाव और साधन आपको हर समय मिल जाएंगे। मंदिर में भगवान की दृष्टि अपने ऊपर बनाए रखने की कामना रखने वालों को यह उत्तर है कि जिसे अपनी दृष्टि पर विश्वास नहीं जब तक स्वयं कीदृष्टि पर संदेह है तब तक सम्यकदर्शन ज्ञान प्राप्त नहीं होगा आप जैसे ही अपनी दृष्टि को धर्म में बदलोगे तो सारी सृष्टि बदल जाएगी और आपके ही अनुकूलनजर आएगी सुख शांति का ग्राफउतना ही ऊपर जाएगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
