भगवान की भक्ति करते समय जिनालय में भक्तों को दर्शन अभिषेक पूजन में बाधा नहीं होनी चाहिएआचार्य श्री वर्धमान सागर जी

धर्म

भगवान की भक्ति करते समय जिनालय में भक्तों को दर्शन अभिषेक पूजन में बाधा नहीं होनी चाहिएआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
पारसोला। 
श्रावक कैसा होना चाहिए श्रावक की क्या परिभाषा है श्रावक को श्रद्धावान, विवेकवान रहकर क्रिया करना चाहिए इसकी विवेचना अभी आर्यिका माता जी के प्रवचन में आपने सुनी ।श्रद्धा धर्म की जड़ है जड़ के बिना जिस प्रकार वृक्ष खड़ा नहीं रह सकता है इस प्रकार धर्म रूपी वृक्ष के लिए श्रद्धा का होना जरूरी है वर्तमान में शासन द्वारा भी सभी जगह वृक्षारोपण किया जा रहा है पारसोला में भी आचार्य शांति सागर जी उद्यान में हमने भी वृक्षारोपण किया वृक्ष के बीजारोपण के बाद उसकी देखभाल जरूरी है बीजारोपण के पूर्व यह देखा जाता है की धरती उपजाऊ है या नहीं वृक्षारोपण की देखभाल उचित होने से वह वृक्ष बड़ा होता है घर में जब एक बालक का जन्म होता है उसे भी आप संभालते हैं ,देखरेख करते हैं उसकी सुरक्षा करते हैं, इसी प्रकार धर्म के बीज को संत समागम से आप लोग लगाते हैं उसे समय-समय पर सीचना, देखभाल करना, उसकी सुरक्षा जरूरी है। देव शास्त्र गुरु की भक्ति से ही धर्म रूपी बीज का बीजारोपण होता है उसको समय-समय पर उसका अंकुरण देखना जरूरी है कि वह वृद्धि को प्राप्त हो रहा है या नहीं धर्म के बीज से भी आपके गुणों में वृद्धि हो रही या नहीं, कृषक किसान भी बीज बोने के पश्चात उसके आसपास निंदाई करता है, सिंचाई करता है अनावश्यक पौधे जो इसकी वृद्धि को रोकते हैं उसे हटाता है तब जाकर फल वृक्ष में लगते हैं। एक कथा के माध्यम से आचार्य श्री ने बताया कि एक संत ने दो कमंडल के माध्यम से शिक्षा दी जिस कमंडल में छेद था वह डूब गया किंतु जिसमें छेद नहीं था वह तैरता रहा इससे यह शिक्षा मिलती है कि आपका मनुष्य जीवन भी कमंडल की भांति है संसार समुद्र से अगर आपको पार होना है तो कर्मों का संवर रोकना होगा कर्मों की निर्जरा करनी होगी तब जाकर आप तैर कर संयम से रत्नत्रय धर्म से संसार समुद्र से पार हो सकते हैं । यह मंगल देश नाम पंचम पट्टाघीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने पारसोला की धर्म सभा में प्रकट की। राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि धर्म का मूल अहिंसा है और अहिंसा के पालन करने के लिए संयम जरूरी है अहिंसा और संयम को तपस्या के माध्यम से जीवन को संभालने की जरूरत है।जिन कर्म से कर्मों का आश्रव हो रहा है उसे द्वार, मार्ग, क्रिया को, आचरण को दूर करना होगा। जिससे नवीन कर्मों का आश्रव नहीं हो। संगीत पर चर्चा करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि संगीत गीत के साथ सम उपसर्ग लगा है अर्थात निर्दोष गीत ही संगीत होता है। आप लोग भगवान के दर्शन स्तुति पूजन करते हैं पूजन भक्ति करते समय आपकी आवाज इतनी अधिक होती है कि अन्य भक्तों को दर्शन, अभिषेक, पूजन ,स्वाध्याय ,जप करने में असुविधा होती है वह अपना पाठ भूल तक जाते हैं। इसलिए मंदिर में श्रद्धा के साथ विवेक का ध्यान रखना जरूरी है तभी आपके कर्मों का आश्रव नहीं होगा धर्म की क्रियो से लाभ रूपी पुण्य अर्जित होना चाहिए भगवान के गुणों की स्तुति करते समय उनके जैसा बनने की भावना करना चाहिए जयमाला में भगवान का गुणानुवाद होता है आरती शब्द की विवेचना में बताया कि आ उपसर्ग के साथ रति शब्द प्रेम भक्ति को प्रदर्शित करती है भगवान की आरती भक्ति करते समय मन में उत्साह होना चाहिएआज प्रातः काल शिष्या आर्यिका श्री महायश मति माताजी का केशलोचन संपन्न हुआ।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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