हमें अच्छी बातों का प्रचार करना चाहिए और धर्म की बातों को घुमाना चाहिए विज्ञानमति माताजी
बांसवाड़ा
श्री श्रेयांशनाथ दिगंबर जैन मंदिर में आर्यिका 105 विज्ञानमति माताजी ने अपनी प्रातः कालीन कक्षा में बताया कि दूसरों के कारण पर पदार्थों के लिए चिंता करना नीच और अधम चिंता कहलाती है। हमें अपनी आत्मा की चिंता करनी चाहिए। अपनी आत्मा का कल्याण कैसे करें यह आत्मा की चिंता है। यह श्रेष्ठ और उत्तम चिंता है।
माताजी ने कहा कि संसार में चिंता मुक्त रहना है तो अच्छी बातें याद रखना और बुरी बातें भूलना श्रेयस्कर है। हम बुरी बातों का बहुत प्रचार करते हैं और अच्छी बातों को दबा देते हैं। लेकिन वास्तविकता में हमें अच्छी बातों का प्रचार करना चाहिए धर्म की बातों को घुमाना चाहिए। बुरी बातों को अपनों तक सीमित कर लेना चाहिए।
माताजी ने कहा कि अच्छे व्यक्तियों में गुणग्राही दृष्टि होनी चाहिए, बुद्धिमानों की अधिकता दिखलाना गुणग्राही दृष्टि है। और मूर्खता को अधिकता दिखलाना दोषग्राही दृष्टि कहलाती है।

गुणों से सुशोभित वचनों का उपयोग करना चाहिए, गुण ग्रहण करने वाले वचनों को कहने की कला विकसित करनी चाहिए। जब कोई संत गर्जना करता है तो श्रावको के दोष दूर हो जाते हैं, जीवन में कभी हारना नहीं क्योंकि जो हार गया वह कभी आगे बढ़ नहीं सकता।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
