आज जरूरत गुरु के बताए रास्ते पर चलने की मुनि श्री वीर सागर महाराज
नेमावर
गुरु को मानने वाले के जीवन में बदलाव आए जरूरी नहीं, लेकिन गुरु की मानने वाले की जीवन तर जाने की गारंटी है। गुरु को सबसे अधिक दुख तब होता है जब वह अपने शिष्य का पतन देखता है। जब वह उन्नति और जीवन कल्याण के पथ पर अग्रसर होगा है तो गुरु को बड़ी प्रसन्नता होती है। जो बीत गया उस पर पश्चाताप करने के बजाए अपने जीवन के शेष समय को कैसे आत्म कल्याण पर लगाए उस पर विचार करें। उक्त उदगार निर्यापक श्री मुनि श्री 108 वीरसागर महाराज ने सिद्ध क्षेत्र नेमावर में धर्म सभा में कहे।
महाराज श्री ने कहा कि जो गुरु को चाहता है, वह गुरु के रास्ते को भी चाहता है। आज जरूरत है गुरु के बताए रास्ते पर चलने की जिसके लिए संकल्प लेना पड़ेगा। गुरु के हाथ में यदि अपना जीवन सौंप दिया तो आपके जीवन का उत्थान कोई नहीं रोक सकता।

उन्होंने कहा कि चातुर्मास का समय अपने जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने का समय है। एक अच्छे श्रावक के साथ-साथ संतों की वाणी को सुनकर आत्मसात करने की जरूरत है।
मनुष्य जब युवा से प्रौढ़ प्रौढ़ से वृद्ध हो जाता है, जब शरीर में शक्ति नहीं रहती नहीं, तब उसे अहसास होता है कि जीवन का पूरा समय
परिवार में लगा दिया। खुद के लिए कुछ किया ही नहीं। गुरु का सानिध्य मिलने पर भी व्यक्ति में सुधार नहीं हुआ तो किस काम का? जीवन को ऐसे ही मत बिता देना?
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
