परम पूजनीय पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विमलप्रभा माताजी के अवतरण दिवस पर भाव भीनी विनयांजली
परम पूजनीय गणिनी आर्यिका 105 विजयमति माताजी की परम शिष्या पट्ट गणिनी आर्यिका 105 विमलप्रभा माताजी यथा नाम तथा गुण को सार्थक कर अपनी विमल वाणी से धर्म की ध्वजा को पुलकित कर रही है।
जीवन परिचय
माताजी के अन्दर बचपन से ही धार्मिक संस्कारो का प्रस्फुटन रहा इनका जन्म बिहार प्रान्त की पावन भूमि के आरा नगर आषाढ़ शुक्ल पंचमी को 1957 मे पिता रेखाचन्द्र जी एवम माता श्री सत्यवती की बगिया मे हुआ इनका जन्म नाम आदेश रखा गया तीन भाइयो मे एक बहन होने से माता पिता एवम भाइयो की अति दुलारी थी

रोचक बात
जिस स्थान से इन्होने बी.ए., बी.एड., की लौकिक शिक्षा प्राप्त की उसी जैनबाला विश्राम में उन्होन6 वर्ष तक शिक्षिका के रूप मे अध्यन कराया।

वैराग्य का प्रस्फुटन सन 1971 मे इनके पिता रेखाचन्द्र जी के निधन की सुचना मिली तब यह सम्मेदशिखर तीर्थ वंदना पर थी उन्हे वहा इसकी सुचना मिली और मन मे वैराग्य की किरणें फुट पड़ी और पार्श्वनाथ टोंक पर स्वयं आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया। संयम के पथ पर यह प्रथम पायदान उन्हे रख दिया लेकिन मन मे लक्ष्य कुछ और ही निर्धारित था दिनों दिन वैराग्य बढ़ता ही गया। वर्ष 1977 मे, जब प्रथम गणिनी आर्यिका श्री 105विजयमती माताजी का चातुर्मास आरा में हुआ। माताजी के सानिध्य मेंवैराग्य भाव और पुष्ट हुआ। फलतः माता जी के साथ आत्मकल्याण हेतु गृह त्याग कर संयम के पथ पर निकल पड़ी और 1978 में पायदान रखते हुए आचार्य श्री 108विमलसागर महाराज से दो प्रतिमा का व्रत ग्रहण किया इन्होने सम्पूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में विजयमति माताजी साथ रहते हुए विहार करते हुए धर्म अध्यन किया औ तमिलनाडु प्रांत में आचार्य कुन्दकुन्द की तपोभूमि पोन्नुरमलै मे इन्होने 1982 मे विजयमती माताजी से सप्तम प्रतिमा व्रत धारण किया। और अग्रसर होते हुए सन 1984 मे विजयादशमी पर माताजी के कर कमलो से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण की और गुरु माँ ने नामकरण करते हुए क्षुल्लिका 105 जयप्रभा माताजी किया ।दीक्षा के बाद आप विभिन्न शास्त्रों और ग्रंथों का गहन अध्ययन किया।
आर्यिका दीक्षा

अब वह समय आ गया जब नारी का उत्क्रष्ट पद आर्यिका दीक्षा प्रदान की वह समय था 28 मई 199 वैशाख शुक्ल पूर्णिमा जब सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी में सिद्धों के मार्ग पर बढ़ने के लिए विजयमती माताजी के कर कमलो से आर्यिका दीक्षा प्रदान और नामकरण करते हुए इन्हे आर्यिका 105 विमलप्रभा माताजी के रूप मे सुशोभित किया
इन्होनेगुरू माँ विजयमती माताजी के साथ पूरे भारतवर्ष
की यात्रा की। और विभिन्न शास्त्रों और ग्रंथों को आत्मसात कर लियाउसी का परिणाम है की गुरु माँ शास्त्र शंका समाधान बड़ी सरलता से करती हैं। पूज्य गुरु माँ के सिद्धहस्त लेखन ने कई रचनाओं को जन्म दिया।
गणिनी पद –
जब प्रथम गणिनी आर्यिका 105 श्री विजयमती माताजी के
श्रवणबेलगोला में सन् 2006 में सल्लेखना हुई उसके पश्चात् तपस्वी सम्राटआचार्य श्री 108 सन्मति सागर महाराज के आदेशानुसार आचार्य श्री 108 विरागसागर महाराज ने 14आचार्यो और 250 साधुओं के समक्ष इन्हे गणिनी पद प्रदान किया। गुरु माँ कितनी सोभाग्य शाली है की आश्विन शुक्ल सप्तमी को उदगाँव में तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मतिसागरजी ने इनका विधिवत गणिनी पद संस्कार अपने हाथों से किया।
धर्म प्रभावना –
पूज्य माताजी पट्ट गणिनी पद को सुशोभित करती हुई जैनधर्म की प्रभावना पूरे भारतवर्ष में कर रही है। हम भी आपके चरणों में भावांजली समर्पित करते हे यही कामना करते है कि हम अज्ञानी जीवोंको सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें ताकि हम भी आपके जैसा ज्ञानी-ध्यानी बनकर आत्म कल्याण कर सकें। और आपके वर्षवर्धन दिवस पर यही भावना भाते है आप दीर्घायु हो पूर्णायु हो हम सबकी भी उम्र लग जाए आप शतायु हो और आपका रत्नत्रय और बलवती हो
अभिषेक जैन लुहाडिया रामगंजमंडी 9929747312
