मनुष्य में यदि क्रोध व लोभ मौजूद है तो उसे किसी अन्य दोष की जरूरत ही नहीं है आदित्य सागर महाराज
कोटा
रिद्धि सिद्धि नगर दिगंबर जैन मंदिर में श्रुतसंवेगी मुनि श्री 108 आदित्य सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में लोभी नहीं बनने की और उद्घोष किया।
महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य में गुण व दोष दोनों विद्यमान होते हैं। हमें उन्हें पहचान कर, गुणों को बढ़ाना, एवं दोषों को घटाना चाहिए। परंतु मनुष्य इसके विपरीत ही करते हैं, और अपनी मंजिल से दूर हो जाते हैं।

महाराज श्री ने कहा की नीति कारों के अनुसार मनुष्य में यदि क्रोध व लोभ मौजूद है तो उसे किसी अन्य दोष की जरूरत ही नहीं है। यह दोष उसका विनाश करने के लिए काफी होता है। अमित क्रोध व लोभ का त्याग करना चाहिए। अपने पुरुषार्थ से धन अर्जित करना चाहिए। धन का संग्रह हो तो उसे दान, दक्षिणा और धर्म पर भी खर्च करें।
महाराज श्री ने लोभ के विषय में कहा कि लोभ ऐसा अवगुण है जो अपने साथ माया व क्रोध लेकर आता है। इसीलिए आसक्ति व लोभ से दूर रहे। कर्म की प्रकृति के अनुसार ही यह शिव कीर्ति फैलती है। हमें उतना ही चादर फैलाना चाहिए जितना समेट सके।
हमें यश की चिंता नहीं करनी चाहिए। यश तो साधना से मिलता है। यह साधना पूरी निष्ठा से होनी चाहिए,तभी प्रतिफल प्राप्त होगा।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
