*जिनशासन के महासूर्य – गणाचार्य विरागसागर जी*
*श्री विशल्यसागर जी*
प. पू . आचार्य भगवन विरागसागर जी
जिनशासन के महासूर्य थे जिन्होंने अपने ज्ञान के प्रकाश के द्वारा विश्व जगत को प्रकाशित किया जन – जन में संस्कार दिये अनेक भूले भटके लोगों को सन्मार्ग पर लगाया एवं व्रत ,नियम , संयम देकर के अनेक भव्य जीवों का उद्धार किया ऐसा महान आचार्य कई सादियों के बाद विश्वधरा को प्राप्त होता है आचार्य भगवन कुंद -कुंद स्वामी की आम्नायें ने एक ऐसे कुंद -कुंद जिन्होंने चारों ओर श्रमण संस्कृति का उत्थान किया है । आचार्य भगवन कुंद – कुंद स्वामी की अध्यात्मा का आत्मसात् कर उनके लिखित महान ग्रंथों को जिन्होंने अच्छी तरह आत्मसात् करके जो अभी जिन ग्रंथों पर टीका नहीं थी जैसे कि आचार्य कुंद – कुंद स्वामी द्वारा लिखित लिंग पाहुड़ , शील पाहुड़ , रयणसार , बारसाणुपेक्खा इन ग्रंथों पर उन्होंने क्रमशः श्रमण सम्बोधनी , श्रमण प्रबोधिनी , सर्वोदया टीका, रत्नत्रयवर्धिनी नामकी विशाल संस्कृत टीकायें लिखी जो साहित्य जगत के लिए
अतिशयकारी और माँ जिनवाणी के कोश के भण्डार को उन्होंने भरा और विद्युत जगत के लिए ऐसे महान श्रेष्ठ कृतियाँ दी जिसके लिए आचार्य भगवन या साधु भगवन जिनका सरलता से,सुगमता से परायण कर सके और आचार्य कुंद -कुंद के ध्येय को समझ सके आचार्य भगवन गुरुदेव ने शास्त्रसार समुच्चय ग्रंथ जो आचार्य माघनंदी कृत चारोंअनुयोगोका ग्रंथ है उस पर महान चूड़ीसूत्र टीका लिखी है जो बड़ी ही अद्भुत है अनेक प्राकृत भक्ति के रचियता आचार्य भगवन गुरुदेव, यूँ कहे आचार्य भगवन गुरुदेव विरागसागर जी महामुनिराज जिन्हें चारों अनुयोगों का अद्भुत ज्ञान था , चारों अनुयोगों में पारंगत थे सिद्धांत के महाज्ञाता , सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्वों को सरलता से प्रस्तुत करने वाले विद्युत जगत में और शिष्यों के अंदर प्रवेश कराने वालें ऐसे आचार्य इसलिए वो सिद्धान्त चक्रवर्ति थे न्याय में प्रकाण्ड इसलिए न्याय चक्रवर्ति थे उनको कहेंगे तो वे निश्चय से त्रिविधाचार्य थे आचार्य भगवन गुरुदेव को हमने बहुत निकट से देखा । आचार्य भगवन गुरुदेव को मैं 93 से जानता हूँ और उनका जो मैंने अद्भुत वात्सल्य प्राप्त किया है वो वात्सल्य उनके रोम – रोम में बसा हुआ था । एक ओर कहते है वात्सल्य रत्नाकर उनके गुरुदेव आचार्य भगवन निमित्तज्ञानी विमलसागर जी महाराज जो पूरे विश्व जगत में विख्यात थे उनकी पूरी की पूरी आभा और वही वात्सल्य और वैसा ही अद्भुत ज्ञान यूँ कहे वैसा ही अद्भुत ज्ञान ,अद्भुत साधना पूरी की पूरी गुरुदेव में परिलक्षित थी ऐसे आचार्य भगवन गुरुदेव विरागसागर जी महामुनिराज श्रमण संस्कृति के उन्नायक,ध्रुव नक्षत्र के महान सूर्य जो अंदर में अज्ञान , अंधकार और मिथ्यात्व को दूर करने वाले और हृदय में सम्यक ज्ञान का आलोक प्रदान किया है ज्ञान अद्भुत था यूं कहेंगे कि आचार्य कुंद – कुंद स्वामी , आचार्य उमास्वामी, आचार्य समंतभद्र स्वामी ,अंकलक स्वामी जैसे महान – महान आचार्यो की परिगणना में उस परिपाटी में ,आम्नाये में,तो आचार्य भगवन गुरुदेव का नाम स्वर्ण अक्षरों में , भूमण्डल पर दिगों – दिगान्तर तक यशस्वी रहेगा ऐसे यशस्वी , मनस्वी , महान तपस्वी और आभा जिनकी तेजस्वी महान कुशल अनुशासक जिनका अनुशासन सभी संघों में विख्यात था कि अनुशासन सम्राट है तो गुरुदेव विरागसागर जी है। अन्य संघ में भी चर्चा करते थे गुरुदेव के अनुशासन की कि देखो आचार्य श्री का अनुसासन क्या है एक साथ एक सूत्र में इतने विशाल संघ को पिरों करके रखना एकता और संगठन का पाठ पढ़ाना और इतने विशाल शिष्य प्रशिष्य पाँच सौ से ऊपर इतने शिष्य , प्रशिष्यों को उसके महान अधिनायक संघ को गुरुदेव कैसे अद्भुत सम्हालते थे वो भी वात्सल्य के साथ और स्वयं पंचाचार का पालन करते हुए और शिष्यों को निर्दोष पालन कराते थे हमेशा कहते थे कि अपनी चर्या मूलाचार के अनुसार करों किसी के जीवन में शिथिलता नहीं होना चाहिए जिन्होंने श्रेष्ठ – श्रेष्ठ कृतियां लिखी चेतन मुनिराजों और आचार्यो को भी लिखा उन्होंने आचार्य विशुद्धसागर जी, आचार्य विशदसागर जी, आचार्य विभवसागर जी , आचार्य विमर्शसागर जी , आचार्य विहर्षसागर जी ,आचार्य विनिश्चयसागर, आचार्य विमदसागर जी आचार्य विन्रम सागर जी जैसे महान – महान आचार्य जो पूरे देश में जो धर्म की पताका फैला रहे है और सात – सात मुनियों को उपाध्याय पद पर शोभित किया और एक ओर देखते है तो पाँच – पाँच गणनी जो आज पूरे देश में धर्म की प्रभावना कर रही है और भी मूलाचार के अनुसार जिन्होंने पंच पद से संघ शोभायमान होना चाहिए मूलचार में जैसा लिखा है आचार्य , उपाध्याय , गणधर , प्रर्वतक , स्थविर पांच पद जिस संघ में होते है वो संघ महान शोभायमान होता है तो उस व्यवस्था को ध्यान में रखकर के आचार्य श्री ने इन पाँच पदों का अलंकरण किया ऐसे महान श्रमण संस्कृति के महान सूर्य जिन्होंने दिगम्बर अवस्था में 41 वर्ष तक उस पद पर शोभायमान रहकर के ऐसे निर्ग्रंथ पंथ को शोभित किया है 41 वर्ष में जिन्होंने महान – महान साधना की है जो निरन्तर अष्टमी , चतुर्दशी को मौन रखते थे , नीरस लेते थे बीच -बीच में उपवास करते थे और जिन्होंने तीन करोड़ से ऊपर जाप की है विशेष – विशेष मंत्रों की जाप करने वाले उनकी साधना बहुत अद्भुत थी भौतिक संसाधनो का पूर्णता त्याग , आध्यात्मिक साधना करने वाले आगम के अनुसार ऐसे महान चारित्र शिरोमणि आचार्य भगवन गुरुदेव विरागसागर की महाराज कौन भूलेगा उनके के लिए एक छोटी सी उम्र में जिन्होंने इस मार्ग को चयन किया वह भारत का मध्य हृदय मध्यप्रदेश मध्य प्रदेश में दमोह जिला जिसमें पथरिया उस धरती को धन्य करने वाले 2 मई 1963 को जिन्होंने जन्म लिया और एक ऐसा अद्भूत सूर्य खिला विश्व के लिए , संस्कृति के लिए मिला किसको पता कि बालक अरविंद छोटा सा बालक विश्व का सूर्य बनेगा । श्रमण संस्कृति का सूर्य बनेगा अनेक लोगों का उद्धार का कारण बनेगा देश के लिए भी जिन्होने अनेक कार्य किए एक और अहिंसा का शंखनाद किया पूरे देश में जगह-जगह शाकाहार सम्मेलन के एक नही दस नही दस लाख लोगो को शाकाहार से प्रभावित किया है । अनेक – अनेक विद्यालय – महा विद्यालयों में शाकाहार का संदेश देना और जगह – जगह बेटी बचाओं , बेटी पढ़ाओ नारी उत्थान के लिए उन्होंने ऐसे ऐसे कार्य किए जो निश्चित है भारतीय संस्कृति के लिए और श्रमण संस्कृति के लिए दोनों के लिए जिन्होंने महान – महान कार्य किए उनके लिए कोई भूला नहीं सकता । न भारतीय संस्कृति भूला सकती है न श्रमण संस्कृति भूला सकती है ऐसा स्वर्ण अक्षरों में नाम है इतिहास के पन्नों में निश्चित है यू कहे ऐसे आचार्य एक पौराणिक पुरुष की तरह अवतरित हुए थे और जिन्होने 20 फरवरी 1980 में तपस्वी सम्राट आचार्य सन्मति से क्षुल्लक दीक्षा ग्रहण की । मात्र 1एक ब्रह्मचारी अवस्था में रहकर के और बुढ़ार में वह क्षुल्लक पद से सुशोभित हुए पूर्णसागर की साधना भी महान थी उनके जीवन में भी अनेक उपसर्ग हुए कर्मो के द्वारा । क्षुल्लक अवस्था में उन्हें तपेदिक जैसी बीमारी हो जाती है लेकिन उस समय में अपनी साधना मे दृढ़प्रतिज्ञ कटी बद्ध रहने वाले ऐसे महान आचार्य जो क्षुल्लक अवस्था में अपने – आप में महान साधक थे जो सल्लेखना लेने के लिए तैयार हो जाते है लेकिन अपने पद को छोड़ने तैयार नही होते है कुछ भी हो मैं अपने आगम अनुकूल चर्या करते ही अपने पथ पर चलूंगा और वह साधना के प्रभाव से वह अद्भुत चमत्कृत होता है कि उनकी तपेदिक जैसी बीमारी भी दूर हो जाती है ऐसे सातिशय योगी थे , लोकोत्तर महा साधक गुरुदेव सर्वोदयी महा श्रमण , सारस्वत महाश्रमण गुरुदेव ऐसे आचार्य भगवन और क्षुल्लक अवस्था में साधना करते हुए । महान अधधेत्ता निरंतर अपनी साधना में रहना और आगम का परायण करना यही उनका लक्ष्य था । धीरे – धीरे आचार्य भगवन विमल सागर जी निमित्त ज्ञानी के पास पहुँचना और क्या नियोग बना और उनके द्वारा दीक्षित होना और उनका जो आशीर्वाद था महान आशीर्वाद था आचार्य विमलसागर जी महाराज ने कहा था इस युग का महान योगी बनेगा आचार्य विरागसागर और जैसा उनके मुँख से निकला बहुत विशाल संघ के नायक होगे ऐसा आचार्य विमल सागर जी ने कहा और वही बात हुई बोले इनके द्वारा खूब दीक्षाये होगी , बहुत संस्कृति का उत्थान होगा और वही जो वचन थे कि वो आचार्य विमलसागर जी निमित्त ज्ञानी उनके लिए वचन सिद्धि थी जो कह दिया वही और ऐसे महान अद्भुत ज्ञानी आचार्य भगवन गुरुदेव विराग सागर महाराज थे जिन्होने अनेक लोगो का उद्घार किया जैसा आशीर्वाद दे दिया वैसा ही होगा एकदम सत्य सावित हुआ गुरुदेव के द्वारा चमत्कृत करने वाले भी अनेक कार्य हुए है तीर्थों का निर्माण तीर्थ के प्रति भक्ति श्रेयांश गिरि जैसे क्षेत्र के प्रति जिसके लिए कोई भी नही जानता था आज वह विश्व पटल पर सभी जानते है विरागोदय जैसे उनके गुरुदेव के आशीर्वाद से अनेक – अनेक विशाल – विशाल पंचकल्याणक आदि किए महान – महान धवला ,जय धवला जैसे ग्रंथो पर वाचनाये हुई देश के विद्वान एक साथ बैठते थे और गुरुदेव के मुख से जब सिद्धान्त की वाचना होती थी तो ऐसा लगता था कि साक्षात भगवान महावीर स्वामी के मुख से दिव्य ध्वनि खिर रही है या गणधर के द्वारा मुखरित हो रही हो ऐसे सरस्वती पुत्र आचार्य भगवन गुरुदेव विरागसागर जी मुनिराज जो निरन्तर ही जिन्होने 32 वर्ष तक आचार्य पद को शोभित किया लेकिन किसको पता था को जो एक महान सूर्य मध्य भारत में उत्पन्न हुआ था वह दक्षिण की ओर अस्त हो जाएगा गुरुदेव ने जो महाराष्ट्र प्रान्त की वह धार्मिक नगरी 9 दिसम्बर 1983 को दिगम्बरी दीक्षा ली ‘। और किसको पता था कि वह महाराष्ट् की धरती पर समाधिष्ठ होगे एक श्रेष्ठ समाधि को करने वाले मैं यू कहूंगा कि अभी तक मेरे देखने में नही आया एक ऐसे महान आचार्य की ऐसी समाधि जो अपने आप में सजग हो एक दिन पहले संघ को सम्बोधित कर रहे हो । और अलग से सारी जिम्मेदारी देकर के समस्त जिम्मेदरी का , पद का त्याग करते हुए और वाकायदा अपने उत्तराधिकारी घोषित करते हुए । आचार्य भगवन विशुद्ध सागर जी महाराज को और संघ की व्यवस्था को इंगित करते हुए कि संघ को कैसे सम्हालना किस प्रकार ध्यान रखना वात्सल्य के साथ वह सब को संदेश दिया और संसार समय का कोई भरोसा नहीं है यह सब कुछ आभास यूं कहे अन्तर बोध था आचार्य भगवन के लिए ,अंतर्यामी थे वो अन्तरंग ज्ञान हर किसी को नही होता है ऐसा लगता है कि आचार्य विमल सागर जी को निमित्त ज्ञान था वही निमित्त ज्ञान आचार्य श्री के अंदर में भी था वो ठीक है कि आचार्य श्री ने उसका उजागर नही किया लेकिन उसका प्रयोग अपने लिए स्वयं किया . और जान लिया कि बस मेरे जीवन का समय निकट आ गया है यही कारण है कि उन्होंने सभी को सम्बोधि करते हुए और पूर्णता पद का त्याग करते हुए सल्लेखना समाधि जैसे मूलाचार में लिखा है , आगम में लिखा है उन्होने स्वयं कहा मूलाचार के अनुसार आगम के अनुसार तीर्थंकर की जो आज्ञा है , जिनेन्द्र देव की जो आज्ञा है उस आज्ञा का पालन करते हुए पूर्णता मैं पदों का त्याग करते हुए और सभी से क्षमा याचना करते हुए क्षमा याचना की । धन्य है ऐसे क्षमा श्रमण के लिए जिन्होंने सबसे क्षमा मांगते हुए सबको क्षमा किया सबको क्षमादान प्रदान किया है जिनके रंच मात्र भी ।ऐसे महान विशुद्धी से सम्पन्न महान आचार्य भगवन गुरुदेव विराग सागर जी महाराज युगों – युगों तक जयवंत रहेंगे और हम सभी शिष्य उनके द्वारा बताये हुए पथ पर चलेगे एक सूत्र में बंधकर के आचार्य भगवन का विशाल संघ है और ऐसे महान संघनायक जो आचार्य भगवन गुरुदेव विराग सागर जी महाराज आचार्य भगवन विशुद्ध सागर जी महाराज का जो पट्टपद देकर के गए है आचार्य भगवन विशुद्ध सागर की जो आज्ञा होगी जैसा मार्गदर्शन होगा उसी अनुसार पूरा का पूरा संघ एकता के सूत्र में बंधकरके चलेगा और श्रमण संस्कृति का शंखनाद करता रहेगा चारों धर्म पताका ध्वजा फहरायेगा बस इसी भावना के साथ ऐसे महान आचार्य गुरुदेव के चरणों में सिद्ध , श्रुत , आचार्य भक्ति पूर्वक बारबार नमन कर रहा हूं वंदन कर रहा हूँ हे भगवन आप युगों – युगों तक जयवंत रहे और आज आपने महान आचार्य बनकर .के पूरे देश के लिए विश्व के लिए दिशाबोध दिया है और आगे जा करके हे भगवन मेरी भावना है कि आप तीर्थंकर बनकर के पूरे विश्व का कल्याण करे और आगे तीर्थंकर बने और ऐसी भावना के साथ गुरुदेव के चरणों मे नमन केवलज्ञान के अविभाग प्रतिच्छेद प्रमाण बारम्बार नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु
संकलन कर्ता राज कुमार अजमेरा,कोडरमा
