सफलता के लिए तन और मन को समझने की नहीं जगाने की जरूरत है भावसागर महाराज
जरुआखेड़ा
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य परम पूज्य मुनि श्री भावसागर महाराज ने मंगल प्रवचन में अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए तन मन लगाने की प्रेरणा दी।
महाराज श्री ने इसके विषय में कहा कि प्रयासों के पश्चात इच्छित फल प्राप्त न होने पर ऐसा महसूस होता है कि हम हार गए हैं, और हम अपने धैर्य को खो देते हैं, गमों को आमंत्रित कर लेते हैं। हार बहाने ढूंढने लग जाते हैं। निराश होकर अपनी हार के लिए दूसरों को दोष देना शुरू कर देते हैं। आगे कार्य करने में उत्साह हीनता आ जाती है। हार में टीका टिप्पणी भी होना स्वाभाविक है। लेकिन टीका टिप्पणी की परवाह किए बगैर जो टिके रहते है, अपने काम में लगे रहते हैं। उनके लिए यही तो है जीत वाली बात।
महाराज श्री ने कहा कि हार जीत का खेल, दिलों दिमाग और तन्मयता का खेल है। जीत और हार में ज्यादा अंतर नहीं होता, सिर्फ एक कदम का अंतर होता है। एक कदम आगे चलने वाला जीत जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि एक कदम पीछे रहने वाला हार गया है। बल्कि इसका मतलब केवल इतना है कि अभी एक कदम और चलने को रह गया है।

महाराज श्री ने कहा कि कामयाबी का ताल्लुक उत्साह से है। जीत उन्हीं की होती है जो अपने काम को पूरा करने में अपने तन मन को लगा देते हैं। और आखिरी क्षणों तक हार नहीं मानते। हारने पर बहानेबाजी ढूंढकर अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करते। जीतने के लिए नए तरीके खोजते है। वह जानते हैं हार का मतलब सब कुछ समाप्त नहीं बल्कि सब कुछ फिर से शुरू करना है। हार के लिए किसी को दोष न दें, न निराश हो बल्कि व्यक्ति से सफलता के मंत्र सीखें। सफलता के लिए तन और मन को समझाने की नही जगाने की जरूरत है। जीतने वाले के समय प्रबंधन समझने की जरूरत है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी9929747312
