*अन्तर्मना उवाच* (18 जून!)
*कभी कभी वक्त के साथ,*
*सब ठीक नहीं..*
*बल्कि सब खत्म हो जाता है..!
*जीवन पल-पल मिट रहा है। आयु का तेल देह के दीये में जलकर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।* अब तुम अपने जीवन के कल्याण और निर्माण के लिए, कोई ठोस साधना करो ताकि मृत्यु को सुखद, सार्थक और खुशनुमा बनाया जा सके। *देह में बैठे पंछी ने पंख फैला दिए हैं। प्राणों का पंछी उड़ान भरने की तैयारी कर रहा है। जल्द ही उड़ान भर लेगा और फिर तुम हाथ मलते रह जाओगे।* प्राण पखेरू उड़े, उससे पहले अपने चरित्र को ऊंचा उठा लो, ताकि तुम्हारा जीवन धन्य हो जाए।
*अब तुम्हारे जीने की शैली कुछ इस प्रकार की हो जाए –*
👉 अपने मन को प्रभु के चरणों में लगा कर जियो और अपनी नजरों को अपने चरणों में जमा कर जियो।
👉 हर पल अपने मन पर निगरानी रखो, कि कहीं सदाचरण से स्खलित ना हो जाए।

👉 हर दिन को आखिरी दिन मान कर जियो।
👉 हर रात को अंतिम रात। हर अगला दिन पुनर्जन्म है।
*धार्मिक होने के लिए अंतिम दिन की प्रतीक्षा ना करें..*
*आज अभी इसी वक्त शुभ कार्य कर डालें…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
