पूज्य मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज संघ का भव्य मंगल प्रवेश भोपाल में हुआ अच्छी सोच व्यक्ति को अच्छा बनाती है, ओछी सोच ओछा बनाती है प्रमाण सागर महाराज
भोपाल
संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्यगुणायतन प्रणेता, भावना योग प्रवर्तक शंका समाधान के जनक परम वंदनीय परम पूज्य मुनिश्री 108 प्रमाणसागर महाराज संसघ पूज्य मुनिश्री 108 निर्वेगसागर महाराज,पूज्य मुनिश्री 108 सन्धानसागर जी महाराज का भव्य मंगल प्रवेश चौक बाजार भोपाल मध्यप्रदेश में हुआ ।
राजेश जैन दद्दू ने बताया कि भोपाल जैन समाज द्वारा मुनि संसघ की मंगलमय अगवानी बड़ी धूमधाम से की गई अगवानी में वरिष्ठ समाजजन , सभी महिला संगठन सोशल ग्रुप सदस्य और इंदौर जैन समाज से भी समाज जन भव्य अगवानी में शामिल हुए।
इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री 108 प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि। अच्छी सोच व्यक्ती को अच्छा और ओछी सोच व्यक्ति को ओछा बनाती है। “हम किसी व्यक्ति की पहचान उसकी बाहर की आकृति से नहीं कर सकते, उसकी पहचान जब भी होगी उसके भीतर की प्रकृति से होगी,

मुनि श्री ने हंसी में कहा कि यदि कोई आपको चार बातें सुनाऐ तो आपको बुरा लगता है,लेकिन मेरी चार बातें सुनने के लिये आप लोग गाजे बाजे के साथ यहा लेकर आये हो?दुनिया में ऐसे लोग बहुत है जिनकी बातें लोग सुनना ही नहीं चाहते, वो भी ऐसी बातें सुनें और सुनायें कि लोग निहाल हो जाऐ! उन्होंने “सोच” पर भी चार बातें सुनाते हुये कहा कि “सही सोचें सुंदर सोचें” “सही देखें सुंदर देखें” “सही बोलें सुंदर बोलें” “सही करें सुंदर करें” यदि यह चार सूत्र हमारे जीवन में आ जाए तो जीवन धन्य हो जाए ।

मुनि श्री ने कहा कि संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो सोच से समृद्ध है, मनुष्य चाहे तो अपनी सोच को रावण की सोच बनाकर अपने जीवन को तबाह कर सकता है,और मनुष्य चाहे तो अपनी सोच को राम की सोच बनाकर एक आदर्श प्रस्तुत कर सकता है, उन्होंने कहा कि हमारे विचारों में ही राम है, और हमारे बिचारों में ही रावण। विचारों में यदि धर्म बोलेगा तो समझना आपके हृदय में राम है, और यदि तुम्हारे जीवन में अधर्म बोल रहा है तो यह मानकर चलना कि नाम भले ही राम का है,लेकिन भीतर रावण का राज्य चल रहा है, हमारी चित्तवृत्ति से ही हमारा जीवन संचालित होता है उन्होंने कहा कि हालांकि हर व्यक्ती अपनी सोच को सुंदर और सही मानता है और उस सोच को सही साबित करने की कोशिश भी करता है।मुनि श्री ने चार प्रकार की भौतिक, व्यवसायिक ,
व्यवहारिक, आध्यात्मिक सोच को बताते हुये कहा कि जिन लोगों की भौतिक सोच होती है ऐसे लोग “मौज मजा और मस्ती” में अपना पूरा जीवन बिता देते है उनके जीवन का एक ही लक्ष्य रहता है जब तक जीओ सुख से जीओ कर्जा लो और घी पीओ”
व्यवसायिक सोच वाले लोग अपने लाभ की सोच वाले होते है ऐसे लोग जल्दी और ज्यादा लाभ उठाने के लिये अपने जीवन को ही व्यापार बना देते है। उन्होंने व्यापार और व्यवहार में अंतर बताते हुये कहा कि जो कार्य लाभ हानि को देखकर किया जाए वह व्यापार तथा जो अच्छे और बुरे ख्याल से किया जाए वह व्यवहारिक सोच कहलाती है।
उन्होंने कहा कि व्यापार करो तो व्यापार की नीती से करो कभी ओवर स्टीमेट मत करो, गुरुदेव हमेशा कहते थे कि “जितनी चादर हो उतना ही पैर फैलाओ” जो लोग ओवर स्टीमेट एवं त्वरित लाभ की सोचते है ऐसे लोग लगातार नुकसान पर नुकसान सहन करना पड़ता है,ऐसे लोग अपनी पूंजी को भी डुबो देते है। अपना व्यवहार ऐसा बनाओ जिससे किसी का दिल न दुखे” जैसे व्यापार में लोगों की बात को सुनते हो उसे नाराज नहीं करते उसी प्रकार से अपने व्यवहार को शालीन और निर्मल बनाओ, अपनी सोच को ऐसी बनाओ कि आपका नौकर भी आपकी प्रशंसा करे बिना न रह सके।उन्होंने कहा कि स्वार्थ और संकीर्णता की दशा में मनुष्य अपना जीवन आगे नहीं बड़ा सकता वही व्यक्ति अपने जीवन को ऊंचा उठा सकता है जिसका चित्त उदार हो, चिंतन विशाल हो हृदय व्यापक हो, ऐसा व्यक्ती खुद ऊंचा उठ सकता है तथा औरो को ऊंचा उठा सकता है। जिसका मानस ऊंचा है,उसका भाग्य भी साथ देता है। “सही सोचिये अच्छा सोचिये” “बड़े सोच से व्यक्ती बड़ा बनता है,वही छोटी सोच से छोटा”
संकलित जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
