मन चंचलता वरदान है, इसे अभिशाप ना बनाये स्वस्ति भूषण माताजी स्मार्ट कौन पुस्तक से संकलित आलेख
छोटा बच्चा जब अधिक दौड़ता है, अधिक खेलता कूदता है, अधिक प्रश्न पूछता है, तो घर वाले अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि बहुत चंचल है, बहुत परेशान करता है। घर का काम नहीं करने देता, दिनभर इसी को संभालने में लगे रहते हैं। भगवान से प्रार्थना करते हैं, गुरुओं से आशीर्वाद मांगते हैं कि इसकी चंचलता कम हो।
चंचलता है यानी गतिशीलता का अधिक होना। बचपन है इसलिए खेलकूद में गतिशील है। समझदारी आयेगी,तो लक्ष्य की तरफ गतिशीलता मुड़ जाएगी। जितनी तेजी से ऊधम कर रहा था, उतनी ही तेजी से मंजिल की तरफ जायेगा। इसका अर्थ है कि बचपन माता-पिता को संभालना पड़ता है, वे सोचते हैं जितने गंभीर हम हैं बच्चा भी इतना गंभीर हो जाये। पर ऐसा हो नहीं सकता। बच्चों की चंचलता को दिशा देने का प्रयास करें। पर बचपन में लक्ष्य का बोध नहीं होता। अतः समझाने पर भी नहीं समझेगा तो क्रोध न करें। बचपन को बचपन के हिसाब से लाड प्यार खेल कूद में रहने दे। उम्र के साथ में गंभीरता स्वयंमेव आती है।
मिट्टी का घड़ा बनाने के लिए, पहले मिट्टी को अनेक प्रयास करके अनुकूल बनाया जाता है। फिर मिट्टी का घड़ा बनाया जाता है। इसीलिए उम्र

परिस्थिति समझ आने पर, जब बात कही जायेगी, तो जल्दी समझ में आयेगी। इसी तरह किसी को बात समझाने के यह पहले उसे अनुकूल बनाना आवश्यक है। अनुकूल कैसे बनाना है, उसका तरीका आपको आना चाहिए। सब्जी छोकते हुए पता है कि तेल कब डालना है, मसाला कब डालना है और सब्जी कब डालना है। कितने गर्म तेल होने पर पूडी डालना है, आपको पता है, किंतु सामने वाले की कान में कौन सी बात कब डालनी है, इस बात का भी पता होना चाहिए। तभी हमारी बात मान्यता प्राप्त होगी।
इंसान के अंदर प्रेम बांटने की भावना अतितीव्र है। पर लेने वाला समर्पित चाहिए। आज सबका अहंकार आसमान छू रहा है कोई किसी का प्रेम लेकर अहसान के बोझ में दबना नही चाहता। और ना ही झुककर किसी के आगे छोटे बनने के लिए तैयार है। अब स्थिति यह आ गई है की लोग प्रेम करने के लिए कुत्ता पालने लगे हैं। कुत्ता पूछ हिलाता है, और मालिक प्रेम करता है। जब इंसान ने पूछना बंद कर दिया, तो कुत्ते की पूंछ की जरूरत पड़ी सम्मान देने से सम्मान प्रेम और गिफ्ट सब कुछ मिलता है।
हम बात करेंगे की मन की गति वरदान है। इसका आशय मन के पास में तीव्र गति है और इस गति पर जो भाव सवार कर देते हैं, मन उसे लेकर तीव्रता से भागने लगता है। मन पर क्रोध के भाव सवार हो, तो उसे लेकर चलने लगता है। मन अपने आप में कुछ नहीं है। मन एक सवारी है, इसमें जो भी भाव रखोगे वही आगे ले जाएगा। अतःमन में यदि अच्छी सोच अच्छे विचार, धर्मध्यान, सम्मान की भावनाएं, वैराग्य भावना भरी जाए, तो वह आत्मा के उत्थान हेतु मुक्ति के रास्ते पर चलना प्रारंभ कर देता है। यदि वह क्रोध, मान, माया, लोभ, हिंसा, झूठा, चोरी, कुशील, परिग्रह में उलझता है तो आत्मा को नरक पहुंचा देता है। मन तो केवल गाड़ी का काम करता है। मन को चलाने वाली आत्मा यदि जागृत है, तो वह मंजिल की तरफ ले जाएगा और यदि आत्मा सुप्त है, तो गाड़ी निश्चित ही दिशाहीन होकर भटक जायेगी। अतः मन को बुरा भला कहने से कोई फायदा नहीं। मन को दिशा लेकर चलाने की कला आत्मा को आनी चाहिए।
आत्मा की ज्ञान की इसमें मुख्य भूमिका है। ज्ञान या तो पूर्व जन्म से साथ आया हो, क्या वर्तमान में शास्त्रों से, प्रवचनों से, सत्संगति से प्राप्त करके भावो को सुधारना चाहिए। मन को सुधारने के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। मां को मनमानी नहीं करने देना है। वरना उस पर संयम का अंकुश लगाना है।
एक उदाहरण के माध्यम सेसमझे जैसे घोड़े को लगाम की, हाथी को अंकुश की, गाड़ी को ब्रेक की आवश्यकता है, यदि यह है तो तीनों मंजिल पर पहुंचा देंगे,वरना भटका देंगे। ऐसे ही ज्ञान और संयम से मन को वश में करके मन से सही दिशा में ले जाने वाले कार्य कराना चाहिये। तभी मन के द्वारा आत्मा धर्म के अमृत का रसपान कर पायेगी। वरना मन रूपी वरदान ही आत्मा के लिए अभिशाप बन जाएगा।
जिस गाड़ी में बैठकर तीर्थ यात्रा की जा सकती है, उसी गाड़ी में महखाने भी जाया जा सकता है। गाड़ी की गति अपने आप में कुछ नहीं, बल्कि जाने वाले सवार के अनुसार गाड़ी चलती है। अतः मन की गति इंसान के लिए वरदान भी बन सकती है और अभिशाप भी।
स्वस्ति भूषण माताजी द्वारा लिखित पुस्तक स्मार्ट कौन से आलेखित लेख
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
9929747312
