आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने हमेशा विश्व कल्याण की बात की है वीर सागर महाराज
सागर
परम पूजनीय आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज के शिष्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 वीर सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि संसार में जो प्राणी है वह अपने लिए जीता है, सब की सीमाएं निर्धारित है, और लोग सीमाओं का उल्लंघन करते समय कहते हैं कि यह हमारी सीमा नहीं है सामने वाले की सीमा है। व्यक्ति पहले अपने मंदिर की सोचता है, फिर दूसरे स्थान की सोचता है, फिर अपने नगर की सोचता है। फिर जिले की, फिर प्रदेश की, फिर देश की और विश्व की सोचता है।
महाराज श्री ने कहा कि लेकिन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने हमेशा विश्व कल्याण की बात की है। जो जीव उन्हे देखते थे, और जो नहीं देखते थे। उन सबके कल्याण के लिए उन्होंने कार्य किया है। उन्होंने कभी किसी के प्रति पक्षपात नहीं किया।

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने विश्व कल्याण और जैन धर्म की पताका को फहराने व तीर्थक्षेत्रों के निर्माण के लिए अद्भुत कार्य किए हैं। आचार्य श्री ने सागर को सबसे बड़ा जिनालय सर्वतोभद्र दिया है। यह भाग्योदय तीर्थ जैसी पावन भूमि पर बन रहा है जहां पर 6 पंचकल्याणक हो चुके हैं। शास्त्रों में बड़े जिनालयों के बारे में पढ़ा और सुना भी था। लेकिन आचार्य श्री ने सागर वालों को यह सौगात उनके समर्पण के कारण दी है। महापुरुष वर्तमान कोनहीं? भविष्य को जान लेते हैं और उसी दिशा में वह कार्य करते हैं। धर्म सुरक्षित कैसे रहेगा? इसीलिए गुरुदेव ने जगह-जगह पाषाण के मंदिर बनवाने का आशीर्वाद दिया था।
महाराज श्री ने कहा कि कुंडलपुर, नेमावर, रामटेक, बीनाबारह सहित कई राज्यों में सैकड़ो स्थानों पर पत्थर के मंदिर का निर्माण कार्य लगातार जारी है। आचार्य श्री इस धरा के ऊपर उठकर सोचते थे जो कुछ नहीं भी दिखता था उसके बारे में भी सोचते थे। वे सारी वसुधा एक हो जाए, एक परिवार की भांति रहे ऐसा सोचते थे। उदार चित्त वाले वह मेरे तेरे में कभी नहीं पडते थे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
