वर्धमान सागर नाम है जपुं दिन रात में…. महाआरती एवं भजनामृत कार्यक्रम में उमड़े श्रद्धालु आरती सजाओं प्रतियोगिता में विजेताओं को चांदी के सिक्के से किया पुरस्कृत
निवाई
सकल दिगम्बर जैन समाज के तत्वावधान में आयोजित सिद्ध चक्र मण्डल अनुष्ठान के अन्तर्गत आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज एवं मुनि हितेन्द्र सागर महाराज संध के सानिध्य में संत निवास नसियां जैन मंदिर पर भजनामृत कार्यक्रम किया गया जिसमें केशव एण्ड पार्टी भोपाल एवं गायिका हेमा जैन ने भजन प्रस्तुत किए गए। जैन समाज के प्रवक्ता सुनील भाणजा एवं विमल जौंला ने बताया कि कार्यक्रम का शुभारंभ सोधर्म इन्द्र सन्मति कुमार कमलेश जैन सुकुमाल जैन महिपाल जैन एवं मोहित जैन चंवरिया ने भगवान शांतिनाथ जी के समक्ष दीप प्रज्वलित करके किया।
भजनामृत कार्यक्रम में गायक केशव एण्ड पार्टी ने आओ बाबा पधारों बाबा… वर्धमान सागर नाम है जपुं दिन रात में… मुझको पार्श्वनाथ से लगाव हो गया…. ओ गुरु सा थारो चेलों बणु म…. दीवाना गुरुवर का दीवाना वर्धमान सागर का…. थाने नेणां म रमाल्यु थाने हिवडा़ म रमाल्यु… केसरिया केसरिया आज हमारो रंग केसरिया…. गायिका हेमा जैन ने गुरुवर की वाणी है कल्याणी जैसे अनेक भजनों की प्रस्तुतियां दी गई जिसमें सेकंडों श्रद्धालुओं ने जमकर भक्ति नृत्य की प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम का संचालन पवन बोहरा एवं महावीर प्रसाद पराणा ने किया। इस दौरान आरती सजाओं प्रतियोगिता आयोजित की गई जिसमें मीनाक्षी भाणजा, सुहानी सुनारा एवं नीरु झिलाय को सोधर्म इन्द्र सन्मति जैन कमलेश देवी जैन द्वारा चांदी के सिक्के पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर नेमीचंद गंगवाल महावीर प्रसाद पराणा, हुकमचंद जैन, जितेन्द्र चंवरिया हेमचंद संधी सुशील गिन्दोडी़ अरविन्द जैन, सुनील गिन्दोडी, मनोज पाटनी, अतुल ठोलिया, शम्भू कठमाणा, पारसमल चेनपुरा, राकेश संधी, जयकुमार सुनारा, लालचंद कठमाणा, महेन्द्र चंवरिया, राजेन्द्र सेदरिया, प्रेमचंद सोगानी, नेमीचंद सिरस, सहित कई श्रद्धालु मौजूद थे। प्रवक्ता राकेश संधी ने बताया कि कार्यक्रम के बीच शशी जैन पाटनी कोलकाता द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए इस दौरान कार्यक्रम का मंगलाचरण आचार्य श्री संधस्थ तारा अम्मा, नीलम जैन, शालू जैन, एवं आयुषी जैन ने किया। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने कहा कि ज्यों ज्यों राग द्वेष की परिसमाप्ति होती है त्यों त्यों वैराग्य वृद्धिंगत होता है। जीवन संयमित अनुशासित हो जाता है। भावनाओं का एवं विचार धाराओं का केन्द्रीय करण हो जाता है। इसी तरह राग द्वेष आदि कर्म कालिमा के विच्छिन्न हो जाने पर मनुष्य भी भगवान बन जाता है। उन्होंने कहा कि राग द्वेष की परिसमाप्ति पर वैराग्य उत्पन्न होता है।


