हमे शास्त्रों को छपवाना चाहिए एवं उनका संरक्षण करना चाहिए स्वस्ति भूषण माताजी
केशवरायपाटन
परम पूजनीय भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्तिभूषण माताजी ने मंगलवार की बेला में श्रुतपंचमी के विषय में प्रकाश डाला एवं जिनवाणी के संरक्षण पर जोर दिया।
पूज्य माताजी ने कहा कि जीवन में हिसाब उसी का रखना चाहिए कि किसने हमें क्या दिया और क्या मिला, लेकिन वर्तमान में इसके विपरीत हो रहा है।

माताजी ने कहा कि आचार्य धरसेन स्वामी से पहले लिखित शास्त्र नहीं थे। पहले अंकलक निकलक जैसे पाठी हुआ करते थे, जो एक बार पढ़ते थे उसे कभी नहीं भूलते थे, लेकिन जब काल के प्रभाव से ज्ञान क्षयोपशम कम होने लगा तो आचार्य धरसेन स्वामी को चिंता हुई। यह रहा तो यह तीर्थंकरों की वाणी, भगवान महावीर की वाणी आगे तक कैसे पहुंचेगी। कैसे जीवों का कल्याण होगा, तब आचार्य धरसेन स्वामी के आशीर्वाद से आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबली महाराज नेषटखंडागम ग्रंथ की रचना की, जिसमें 6 खंडों के माध्यम से जिनवाणी का वर्णन किया है।
मंगलाचरण की रूप में णमोकार मंत्र को सर्वप्रथम उस ग्रंथ में
लिपिबद्ध किया। उससे पहले णमोकार महामंत्र कभी लिखा हुआ नहीं था। पूज्य माताजी ने आगे कहा कि आचार्य साधु संतों का हम सब पर बड़ा उपकार है, जिन्होंने निस्वार्थ होकर कठिन परिश्रम और पुरुषार्थ से अनेक ग्रंथों को लिपिबद्ध किया। भगवान महावीर की परंपरा को आगे बढ़ाया। हमें भी उस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। हमने उसे परंपरा को आगे नहीं बढ़ाया तो हम स्वार्थी साबित हो जाएंगे। हम तो लाभ लेकर अपना कल्याण कर लेंगे, लेकिन हमारे आगे की पीढ़ी धर्म से ज्ञान से वंचित रह जाएगी। हमें शास्त्र को छपवाना चाहिए और उनका संरक्षण करना चाहिए। ज्ञान ही हमारा स्वरूप है। ज्ञान से ही जीवन चलता है। जब तक लोग कषाय आदि में लगे रहते हैं तब तक ज्ञान ज्ञान क्षयोपशम कम व कर्मबंध होता है, लेकिन स्वाध्याय से हमारा ज्ञानार्जन होता है और मन शांत रहता है।संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
