आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज विषयों की आशा नही जिनके, साम्य भाव धन रखते है

धर्म

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज विषयों की आशा नही जिनके, साम्य भाव धन रखते है
परम पूज्य आध्यात्मिक सन्तशिरोमणि आचार्य 108श्री वर्धमान सागर जी महाराज वर्ष 1987 का वर्षायोग अनेक धार्मिक कार्यकलापों के आयोजन के साथ मदनगंज में चल रहा था। धर्म-प्रभावना के बीच मदनगंज वासी देख रहे हैं मुनिश्री वर्धमान साग़रजी महाराज का अनूठा संघ संचालन, उनकी वात्सल्य प्रवर वरिष्ठ साधुओं के प्रति वैयावृत्ति, प्रतिपल वर्धित होते उनके ज्ञान, चर्या,वक्तव्य एवं संयम साधना को ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

श्री गुलाबचन्दजी गोधा समेत सभी अग्रणीजन के हृदय में एक ही सोच है की “मुनि श्री वर्धमानसागरजी कोउपाध्याय पद पर प्रतिष्ठित किया जाए।” श्री गोधाजी के मनोमस्तिष्क में आचार्य श्री धर्मसागरजी महाराज के वे शब्द गूंज रहे हैं “म्हारे संघने तो वर्धमान सम्हाल सके।” गोधा जी ने प्रमुख लोगों को साथ लेकर सलूम्बरमें विराजित श्री अजित सागर जी महाराज के सन्मुख समाज की इस भावना को मूर्तिमान करने की दो-तीन बार अभ्यर्थना की। बात सुनकर आचार्यश्री प्रायः मौन हो जाते। समाज के अति आग्रह पर आचार्यश्री ने यही उत्तर दिया कि “वर्धमान को एक बार मेरे पास पहुँचा दो।” जब इसउत्तर से मन नही माना तो समाज ने उदयपुर में विराजित विदुषी आर्यिकाश्री विशुद्धमती माताजी के पास जाकर निवेदन किया कि “किसी प्रकारआचार्य श्री अजितसागरजी महाराज से किसी तरह आज्ञा मिल जाए।यह बात सुनकर विदुषी आर्यिका श्री विशुद्धमती माताजी ने कहा किवर्धमानसागरजी महाराज विचारज्ञ हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि बिना किसी पद के भी वे संघ को सम्हाल लेंगे।” यह उत्तर भी मदनगंज वासियों को संतुष्ट न कर सका। फिर सबने सोचा कि “पिच्छिका परिवर्तन के साथही मुनिश्री को उपाध्याय घोषित कर उनकी जय-जयकार कर देंगे।”कुशाग्र बुद्धि मुनिश्री को आभास हो गया की समाज की भावना का अतः पिच्छिका परिवर्तन के पूर्व ही उन्होंने अपने धर्मोपदेश के मध्म्र्वक कहा, “चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागरजीमहाराज की इस निर्मल अक्षुण्ण परम्परा में अभी तक दो पद नही हुए,संघमें मात्र एक आचार्य पद ही रहा है। मदनगंज की समाज इस संघ कीअनन्य भक्त है अतः यहाँ की समाज संघ परम्परा के विरुद्ध कोई कार्यकरने की नही सोचे, हम किसी भी पद को स्वीकार नही करेंगे। हमारे संघके परम्परागत आचार्य श्री अजितसागर जी महाराज विद्यमान हैं। यह संघ उन्ही के अनुशासन में है और रहेगा।”
संकलित अभिषेक जैन लुहाडीया रामगंजमडी

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