स्मार्ट कोन
स्मार्ट कोन है इस विषय पर भारत गौरव गणिनी आर्यिका 105 स्वस्ति भूषण माताजी ने एक पुस्तक का संकलन किया है उसी में से कुछ आप सभी से साझा कर रहा हु
स्मार्ट शब्द का अर्थ है, बुद्धिमान, चतुर, होशियार। और वर्तमान समय में भारतीयों ने इसका अर्थ अलग कर दिया है। जब कोई अच्छे कपड़े पहन के, अच्छा मोबाइल हाथ में लेकर, श्रृंगार करके, अच्छी घड़ी पहन के, बढ़िया इंग्लिश बोलना है तो लोग कहते हैं, क्या स्मार्ट है। थोड़ा और आगे बढ़े अच्छे कपड़े पहनने के बाद ही स्मार्ट होने का लेबल लगा देते हैं। आज मोबाइल का नाम स्मार्टफोन रख दिया गया है। स्मार्टफोन यानी बुद्धिमान, होशियार,चतुर फोन। और लोग सोचते हैं इस फोन को लेकर हम भी स्मार्ट हो जाएंगे।
यदि अच्छे कपड़े पहनने से स्मार्ट बनते तो, कपड़े की दुकान में खड़ी डमी सबसे अच्छे कपड़े पहनती है, तो वह स्मार्ट होना चाहिए। घड़ी स्मार्ट बनती है, तो वह घड़ी की दुकान स्मार्ट होगी। यह सारी चीजे स्मार्ट होने का लेबल नहीं है। खुद को कुछ करना ना पड़े और स्मार्ट बन जाए। लोगों की सोच ने मोबाइल, कपड़े और घड़ी की कीमत बढ़ा दी। अब लोग अपनी क्वालिटी बढ़ाने के बजाय वस्तुओं की क्वालिटी के द्वारा अपनी कीमत करवाना चाहते हैं। जबकि ऐसा हो ही नहीं सकता।
कुछ लोग पतले होकर स्मार्ट दिखाना चाहते हैं। इसके लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है। कोई जिम जा रहा है, कोई सुबह 2 घंटे एक्सरसाइज करता है, और डाइटिंग तो हर लड़के लड़की कर रहे हैं, भूखे घूमते रहते हैं, क्योंकि मोटे होने पर उनकी स्मार्टनेस दिखाने पर फर्क पड़ता, कौन सी किताब में लिखा है कि पतले स्मार्ट होते हैं, मोटे नहीं। छोटे-छोटे बच्चों में डाइटिंग की बीमारी लग गई। छोटी सी बच्ची कहती है मैं दूध नहीं पिऊंगी, मैं मोटी हो जाऊंगी। जैसा मां करेगी, बच्ची भी करेगी। वे व्रत उपवास नहीं करती पर डाइटिंग कर लेती है। जिससे उनका शरीर सूखता जाता है। दिमाग तो तेज काम करता है पर शरीर काम करने में मना कर देता है। फिर वे इसी बात से परेशान रहते हैं। अनेक तरह की शरीर में बीमारी हो जाती है, चक्कर पे चक्कर आने लगते हैं। अपने हाथ से अपने पैर पर कुल्हाड़ी पटक लेते हैं।

स्मार्ट का मतलब ऐसा व्यक्ति जिसकी लोग प्रशंसा करें। प्रशंसा इसलिए करें कि उसके अंदर विशेष गुण है। इसको देखकर उन लोगों के मन में भी उनके जैसे कार्य करने की भावना होती है। उसके जैसे बनने की भावना होती है। उसको कहते हैं स्मार्ट। सामने वाले के कपड़े देखकर वैसे कपड़े पहनने की भावना स्मार्ट नहीं है। ज्वेलरी और घड़ी स्मार्ट नहीं बनाएगी। दो क्षेत्र हैं लौकिक क्षेत्र और अलौकिक क्षेत्र। लौकिक क्षेत्र में किसी ने स्कूल में अच्छे अंक प्राप्त किये, तो उसे देखकर अन्य बच्चों को लगता है, मुझे भी अच्छी पढ़ाई करनी है। आईएस को देखकर आईएस बनने के भाव आना। गीत संगीत की भावना करना। नृत्य करते देखकर नृत्य की भावना करना। ये कार्य लौकिक स्मार्ट बनते हैं। बुद्धिमान बनाते हैं इंसान की कीमत बढ़ाते हैं।
अलौकिक आध्यात्मिक क्षेत्र में यदि देखा जाए तो जिन संत को देखकर उनके जैसे बनने की भावना आना अर्थात साधु संतों के ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, ध्यान को देख कर वैसा करने की भावना आती है तो साधु भी स्मार्ट है, भले ही वे सफेद कपड़े पहनते हो या आपके मुनिराज हो, जो कपड़े भी नहीं पहनते हैं। पर यदि उनका प्रभाव आप पर पड़ रहा है तो स्मार्ट है। यदि कपड़े पहनने से ही स्मार्ट बनते, ज्वेलरी और घड़ी पहनने से स्मार्ट बनते तो हमारे भगवान तो ना कपड़े पहनते हैं, न ज्वेलरी, न घड़ी पहनते हैं। फिर अनंत काल से बुद्धिमान, ज्ञानी जीव उनके जैसे बनने का प्रयास करते हैं। और अनंत जीव उनके जैसे बनकर सुखी भी हुए हैं।
संसार में कहीं ऐसा नियम हो कि अच्छे कपड़े पहनकर सुखी होते हैं। फैशन के कपड़े पहनकर सुखी होते हैं, तो अन्य कार्यों का महत्व खत्म हो जाता। कपड़े सुखी नहीं करते, दुखी करते हैं। इसलिए भगवान ने कपड़े छोड़दिए। वर्तमान समय में ब्यूटी पार्लर में जाकर तरह-तरह के बाल बनाकर स्मार्ट बनते हैं। करोड़ों का बिजनेस बालों के द्वारा चल रहा है। और स्मार्ट दिखने का प्रयास कर रहे हैं। यदि स्मार्ट बालों से बनते तो जिनके सिर पर बाल नहीं है वह तो कभी स्मार्ट बन ही नहीं पाते। और हमारे साधु तो केशलोच करके निकाल कर फेंक देते हैं। फिर भी लोग उन्हें पूजते है। फिर भी उनका अनुशरण करते हैं। लोगों को स्मार्ट बनने में अपनी सोच को बदलना होगा। वरना यह संसार गलत रास्ते पर चला जाएगा।
स्मार्ट व्यक्ति सुखी व्यक्ति की श्रेणी में आएगा दुखी व्यक्ति की श्रेणी में नहीं। क्योंकि स्मार्ट यानी बुद्धिमान होशियार है वह अपने ज्ञान और होशियारी से अपने जीवन को उत्कृष्ट बनाएगा। अपने जीवन में गुणों का बाग लगाकर जीवन को महका देगा, स्वयं सुखी होगा, औरों को भी सुखी कर देगा। स्मार्ट होकर दुखी रहे औरों को भी दुखी करें, वह ऐसा नहीं हो सकता। वर्तमान समय में युवा बच्चे स्मार्ट बनने के लिए अच्छे कपड़े, अच्छा मोबाइल लेते हैं और न मिलने पर माता-पिता को परेशान करते हैं। उनके कारण माता-पिता दुखी रहते हैं हम अपने बच्चों की इच्छा पूरी नहीं कर रहे हैं। तो बच्चे उल्टा माता-पिता को दोस्तों का नाम लेकर उल्टा बहस करते हैं जिस घर में क्लेश का वातावरण बन जाता है।
अथवा वर्तमान समय में युवा पीढ़ी स्मार्ट बनने के लिए अच्छे कपड़े के लिए, घूमने फिरने और मौज मस्ती के लिए चोरी करते हैं, चैन काटते हैं। बैंक लूटते है वह लड़कियां कभी-कभी कॉल गर्ल का काम भी करने लगते हैं। पर स्मार्ट दिखने में कमी नहीं आनी चाहिए। आत्मा को चाहे कितना दुखी कर ले पर ऊपर से सुंदर दिखने में कमी नहीं होनी चाहिए। युवा, जब पुलिस द्वारा पकड़े जाते हैं तो पिटाई होती है। बदनामी होती है।
सही को गलत समझना कलयुग की निशानी। आज युवा पीढ़ी में, अमीर घराने के लोगों को स्मार्ट बनने के लिए शराब सिगरेट जैसे व्यसन भी जरूरी हो गए हैं वरना लोग उन्हें बैकवर्ड मानते हैं। शराब जैसे बुरे व्यसन को जिस काल में अच्छा मानने लगे तब समझना कि दुखमाकाल का प्रभाव अब तीव्रता से बढ़ रहा है। इसका अर्थ है की दुख बढ़ेगा। यह मिथ्या दृष्टि की सोच है कि बुरी चीजों में सुख का अनुभव करता है। शरीर भले स्वीकार ना करे पर दिखाने के लिए पीते हैं। कुछ लोग समझते हैं कि इससे स्टैंडर्ड कम हो जाएगा। किसी का नाम कलयुग यानी पाप का युग। गलत रास्ते पर चलने के बाद अपने आप को सही समझना। सही रास्ते पर चलने वालों की हंसी उड़ाना।
वर्तमान समय की पीढ़ी की स्मार्ट बनने की परिभाषा में गांधी तो स्मार्ट नहीं है। जिन्होंने देश को आजाद करवाया। जिन्होंने अनेक किताबें लिखी। जिन्होंने गरीब जनता को ध्यान में रखकर स्वयं भी कम कपड़े पहने, देश को नई सोच दी। देश के युवाओं की ऐसी सोच, देश को फिर पराधीन बना देगी। झूठा दिखावा के चक्कर में अंदर से खोखले होते जा रहे हैं। अंदर की जड़ कमजोर हो, और पेड़ हरा भरा रहे, ऐसा ज्यादा समय तक नहीं टिकने वाला। जरा सी आंधी तूफान में वह गिर जाएगा।
गुलदस्ते के फूल
वर्तमान पीढ़ी गुलदस्ते के फूल के समान है। जैसे गुलदस्ते की फूलों की मुस्कुराहट ज्यादा समय की नहीं है, क्योंकि वह जड़ से अलग हो चुका है। गुलदस्ते के फूल दिखाते सुंदर हैं पर ज्यादा समय तक उनकी सुंदरता नहीं रहेगी जल्दी मुरझा जाएंगे। ठीक है ऐसी वर्तमान पीढ़ी जल्दी खुश हो जाती है और जल्दी मुरझा जाती है। धैर्य, धीरज, सहनशीलता, पेशेंस जैसे गुण उनमें से कम होते जा रहे हैं। जल्दी क्रोध से गर्म हो जाना, जल्दी नाराज होकर बर्फ से ठंडे पड़ जाना। शरीर में दम नहीं इसलिए जल्दी बीमार हो जाना। किसी भी व्यक्ति विषय को दिमाग में रखकर टेंशन में आ जाना। जल्दी ही सारी बातों को व्यक्त करना, जिसकी आवश्यकता नहीं। अगर तुम्हें दोस्तों से रिश्ता निभाना, होटल और पार्टी में सुख मानना। धर्म को
दकियानूसी मानना धर्म और धर्मात्मा को पुराने विचारों का मानना। गुरुओं का सम्मान नहीं करना। ये सारे कार्य इंसान के चारित्र का पतन कर रहे हैं।
स्मार्ट कुत्ते
वर्तमान में एक फैशन में और जोड़ पकड़ रखा है। कुत्ता पालने का। सभी पशु पक्षी जैसे कुत्ता भी एक जानवर है। जानवर, जानवर के बीच रहकर अच्छा महसूस करता है। पर इंसान को कुत्ता बहुत पसंद आया इसीलिए उसने कुत्ता पालन शुरू कर दिया। कुत्ते में एक गुण है मालिक को देखकर पूंछ हिलाता है, और एक दोष है कि अपने जाति भाई को देखकर भोंकता है। पूंछ हिलाने वाले के गुण को देखकर मनुष्य ने इसे घर में पाल लिया। पूंछ हिलाने का मतलब सम्मान देना। घर में कोई सम्मान दे या ना दे कुत्ता तो दे ही रहा। सम्मान का भूखा मनुष्य, मनुष्य से सम्मान ना मिलने पर कुत्ते से सम्मान प्राप्त कर रहा है। वर्तमान में कुत्ते से इतना प्यार किया जा रहा है कि उसका खाना, नहाना और पालने का खर्चा एक मनुष्य से भी ज्यादा है। और सीमा तब पार हो जाती है जब मनुष्य कुत्ते का पट्टा हाथ में लेकर अपने आपको स्मार्ट घोषित करता है।
पहले गाय, भैंस के बाजार होते थे पर अब तो कुत्तों का भी बाजार हो गया है। पूरे विश्व में कुत्तों का व्यापार बड़ी जोरों पर है। किसी किसी घर में मनुष्य कम मिलेंगे पर कुत्ते ज्यादा मिलेंगे। उनसे प्यारमनुष्यो से ज्यादा किया जा रहा है। कोठी पर कुत्ता ना हो तो कोठी सुनी लगती है। सबसे बड़ी बात स्टैंडर्ड तो कुत्तों से बनता है। जितना समय कुत्तों के लिए दिया जा रहा है। उतना समय आत्मा और परमात्मा के लिए दिया जाए तो वास्तविक सुख प्राप्त हो जाए। पहले समय में जब बच्चे आपस में लड़ते थे तो गुस्से में एक दूसरे को कुत्ता नाम की गाली देते थे, पर अब तो इस गाली का स्वरूप ही चेंज हो गया।
अब लोग कपड़े, घड़ी, बाल, कोठी गाड़ी के साथ कुत्ते के साथ स्मार्ट अपने आप को स्मार्ट की पूर्णता मानते हैं। भगवान महावीर कहते हैं कि जिससे ज्यादा प्यार करोगे, अगले जन्म में इस पर्याय में जाओगे। मकान से करोगे तो छिपकली बनोगे। नोटों से करोगे तो नोट में कीड़ा बनोगे, धन से करोगे तो सांप बनोगे, और कुत्तों से करोगे तो, यदि प्रेम ही करना है तो अपनी आत्मा से करो, अपने शरीर से भी नहीं। निजात्मा का प्रेम आपको पाप से बचाएगा और परमात्मा बनायेगा।
स्वस्ति भूषण माताजी की पुस्तक स्मार्ट कौन से आलेखित विचार
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
