श्रुत पंचमी का आध्यात्मिक धार्मिक महत्वआर्यिका श्री महायश मति संघस्थ आचार्य श्री वर्धमान सागर जी

देव शास्त्र गुरु हमारे आराध्य है भगवान श्रीं आदिनाथ से लेकर भगवान श्री महावीर स्वामी तक सभी तीर्थंकरों ने केवल ज्ञान को प्राप्त कर समवशरण में दिव्य देशना दी जिसे गणघर स्वामी के माध्यम से धर्म देशना जिनवाणी सभी तक पहुंचती थी यह परंपरा गणघर स्वामी से लेकर अंतिम केवली जंबू स्वामी से होते हुए अनेकआचार्यों से जिनवाणी का प्रसार हुआ। दिगंबर आचार्य घरसेन जी ने यह महसूस किया कि जिनवाणी को लिपिबद्ध होना जरूरी है ताकि आने वाले समय में सभी समाज इसको पढ़कर धर्म लाभ ले सके गुजरात गिरनार जी पर्वत पहली टोंक के पीछे सहस्त्रावन की गुफा में उन्होंने उसके लिए अपने सुयोग्य शिष्यों की परीक्षा लेकर चयन किया दो शिष्य मुनि श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबली सागर जी का उन्होंने चयन किया उन्हें एक-एक मंत्र जाप करने को दिया दोनों मुनियों श्री पुष्पदंत सागर और श्री भूतबली सागर ने उन मंत्रों का जब जाप किया तो एक शिष्य के सामने देवी प्रकट हुई जिसके दांत बाहर थे, दूसरे शिष्य के सामने देवी प्रकट हुई जिसकी एक आंख नहीं थी ।दोनों मुनि समझ गए कि मंत्र कुछ अशुद्ध है उन्होंने ध्यान से उसे मंत्र को पढ़कर उसमे मात्रा संबंधी जो अशुद्धता थी उसे ठीक की, और उन मंत्रों का पुनः जाप किया जाप पूर्ण होने पर दोनों के समक्ष सुंदर देवियां प्रकट हुई। दोनों मुनिराज श्री पुष्पदंत सागर जी और मुनि श्री भूतबलीसागर जी आचार्य श्री के पास पहुंचे उन्हें पूरी घटना बताई ।तब आचार्य श्री ने बताया कि मैंने आपकी परीक्षा लेने के लिए मंत्रो में मात्रा कम या ज्यादा की थी, जिसे आपने अपनी बुद्धिमत्ता से ठीक कर मंत्र को सिद्ध किया है। दोनों शिष्यों ने षटखंडागम शास्त्र रचना की जिस दिन शास्त्र पूर्ण हुआ वह दिन ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी का दिन था उसी कारण समस्त आचार्यों की प्रेरणा से जैन समाज इस पावन पवित्र दिन को श्रुत पंचमी के रूप में नगर में जिनवाणी की शोभा यात्रा निकाल कर उसकी पूजन करते हैं।देव शास्त्र और गुरु हमारे आराध्य है ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जैन धर्म की पवित्र तिथि है जिस दिन जिनवाणी माता पहली बार शास्त्र के रूप में अंकित हुई इसी कारण से श्रुत पंचमी कहा जाता हैं इस दिन जिनवाणी माता का जुलूस निकाल कर विशेष पूजन की जाती हैं।ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी जो 11 जून 2024 को है। वात्सल्य वारिधी पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज द्वारा 24 फरवरी फागुन शुक्ला 8 सन 1969 मुनि दीक्षा लेने के मात्र तीन माह के भीतर नेत्र ज्योति ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी 19 मई 1969 को अपने आप चली गई थी। उस दिन शारीरिक नेत्र ज्योति चली गई किंतु उसी दिन श्रुत पंचमी पर आत्मा प्रकाशवान हो गई ।इस तिथि पर नेत्र ज्योति जाने के बाद जो प्रभु का चमत्कार हुआ जो शांतिभक्ति स्रोत भगवान के आशीर्वाद 47 साधुओं की शुभ भावना से असंभव कार्य संभव हुआ जैन धर्म का महत्व विश्व के पटल पर सामने आया और यह तिथि इतिहास में अंकित हो गई है ।प्रसंग है सन 1969 ज्येष्ठ माह की पंचमी 19 मई 1969 को जब नवदीक्षित 19 वर्षीय युवा मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज और 46 साधुओं के साथ जयपुर खनिया जी में विराजित रहे। इसके पूर्व मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की मुनि दीक्षा आचार्य श्री धर्म सागर जी के सिद्ध हस्त कर कमलों से 24 फरवरी 1969 को श्री महावीर जी में हुई। ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी को अनायास मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज की नेत्र ज्योति चली जाती है, शाम के समय डॉक्टरों द्वारा नेत्र परीक्षण किया जाता है डॉक्टर ने कहा कि अगले दिन नेत्र परीक्षण करेंगे। अगले दिन को प्रातः डॉक्टर द्वारा मुनि श्री के नेत्रों का परीक्षण किया जाता है । डॉक्टर अनुसार अगर अगले 24 घंटे में डॉक्टरी इंजेक्शन और इलाज नहीं किया जाता है तो नेत्र ज्योति हमेशा के लिए चली जाएगी, संघ में विचार विमर्श होता है अनेक प्रकार की चर्चा चलती है, नव दीक्षित युवा मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज सोचते हैं मेरे पाप कर्मों का उदय है मुझे समता भाव से सहन करना होगा ।चेहरे पर दर्द वेदना के स्थान पर निर्मोहता और समता झलक रही थी
।19 वर्षीय मुनि श्री का चिंतनउपसर्गों की लंबी श्रृंखला मुनि श्री
वर्धमान सागर जी चिंतन करते हैं कि मैं कायर, पलायनवादी नहीं हूं। अनेक मुनिराजो ने परिषह सहन किए हैं। महामुनि सुकुमाल शिवभूति मुनिराज ,पांडव मुनिराज ,मुनि गजकुमार, मुनिराज जंबू स्वामी भट्ट अकलंक सहित अनेक मुनियों ने उपसर्ग सहन किए हैं। भगवान पारसनाथ जिन पर अनेक भवो में उपसर्ग हुआ। उन्होंने भी उपसर्ग सहन कर केवल ज्ञान प्राप्त किया। आचार्य श्री शांति सागर जी की में परंपरा का मुनि हूं ,जिन्होंने दीक्षा काल में सर्प का, सिंह का, चींटी मकोड़े ,अनेक मानवीय उपसर्ग भी सहन किया ।अगले दिन कोई सुधार नहीं होता है संघ में चर्चा होती है युवा है दीक्षा छेदन करे इलाज करा कर पुनः दीक्षा दे सकते हैं।मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज के समक्ष चर्चा आने पर सहजता और दृढ़ विश्वास से कहते हैं कि मैं डॉक्टर से इंजेक्शन और अंग्रेजी दवाई नहीं लूंगा भले ही मुझको सल्लेखना लेनी पड़े ।इस घटनाक्रम में नेत्र ज्योति जाने को 49 घंटे हो चुके थे। मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज मुनि श्री श्रुत सागर जी ,आर्यिका ज्ञानमती माताजी और अन्य साधुओं के माध्यम से आचार्य श्री तक निवेदन करते कि मुझे श्री चंद्र प्रभु भगवान की बेदी पर भक्ति करनी है तेज धूप होने के बावजूद मुनि श्री और अन्य साधुओं की इच्छा पर शांतिभक्ति का पाठ मुनि श्री वर्धमान सागर जी प्रारंभ करते हैं उनके साथ अनेक साधु , माताजी भी शांति भक्ति का पाठ करते हैं लगातार 3 घंटे शांति भक्ति का पाठ चलता हैसाधु वात्सल्य और प्रेम ,अनुराग का अनुपम उदाहरण अंतर्गत मुनि श्री अभिनंदन सागर जी भगवान के समक्ष नेत्र ज्योति वापस आने तक सभी 6 रसो का त्याग करते हैं,आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी कहते हैं ,भगवान इस अल्पायु में महान दीक्षा और इतना बड़ा उपसर्ग, आर्यिका श्री ज्ञानमती जी कहती हैं भगवान आप बड़े हो या डाक्टर ,मुनि श्री संभव सागर जी बीमार होने के बाद भी जाप करते हैंभगवान का चमत्कार होता है लगातार 3 घंटे शांति भक्ति का पाठ होने के बाद 52 घंटे पूर्व गई नेत्र ज्योति पूर्ववत प्राप्त हो जाती है। उसे समय सभी साधुओं में उपस्थित हजारों समाज जनों में हर्ष व्याप्त हो जाता है प्रभु की जय जय कार होती हैं,नगर में उत्सव का माहौल हो जाता है। आर्यिका श्री ज्ञानमती जी कहती है
मेने अपने जीवन में ऐसी प्रभु भक्ति कभी देखी नही है ।47 साधुओं का सानिध्य लगातार 24 घंटे शांति भक्ति का पाठ निरंतर चलता है। जिस समय जयपुर में यह घटना हुई तब आचार्य धर्म सागर जी, आचार्य कल्प श्री श्रुत सागर जी, मुनि श्री अजीत सागर जी ,मुनि दयासागर जी ,मुनि श्री श्रेयांस सागर जी ,मुनि श्री संभव सागर जी, मुनि श्री सुबुद्धि सागर जी,मुनि श्री अभिनंदन सागर जी सहित 17 मुनिराज तथा आर्यिका श्री वीरमति जी, आ श्री आदिमती जी, आर्यिका ज्ञानमती जी आ श्री विशुद्धमतीजी सहित 25 आर्यिका माताजी तथा चार क्षुल्लक और एक क्षुल्लिका माताजी सहित 47 साधु लगातार भक्ति करते रहे



वर्तमान प्रत्यक्षदर्शी वर्तमान में स्वयं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी, महाराज गणनी प्रमुख 90 वर्षीय आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी
आर्यिका श्री शीतल मति सहित अन्य साधु और पीठाधीश श्री रविंद्र कीर्ति जी वर्तमान में इस घटना के साक्षी हैं। इनके सहित जयपुर के सैकड़ो व्यक्ति आज भी विद्यमान है जिन्होंने इस घटना को अपनी आंखों से देखा है इस चमत्कार को देखा है ।शांति भक्ति की रचना हजारों वर्ष पूर्व पूज्यपाद स्वामी मुनिराज को आकाश गामिनी विद्या हासिल थी, वह आकाश में गमन कर रहे थे ,सूर्य की तेज प्रचंड रोशनी से उनके नेत्र ज्योति चली जाती है तब वह भगवान के समक्ष शांति भक्ति की रचना करते हैं शांति भक्ति की रचना करने से उनकी नेत्र ज्योति वापस आ जाती है। अगर यह घटना उस समय नहीं होती तो किसी को हमारे प्राचीन आगम प्रणीत ग्रंथो में धार्मिक स्रोत पर विश्वास नहीं होता ।आज श्री भक्तामर स्तोत्र की कहानी सभी लोग जानते हैं कि राजा भोज ने जैनाचार्य श्री मानतुंग स्वामी को जेल की 48 कोठरी में बंद कर दिया था तब श्री मानतुंग आचार्य ने भक्तामर स्त्रोत की रचना की, एक-एक श्लोक पूरा होता गया एक-एक ताले टूटे गए 48 काव्य की रचना के बाद सभी ताले टूट गए। जैन धर्म के महत्व को सभी को समझना चाहिए कि आज भी इसमें श्रद्धा और भक्ति से पाठ किया जाए तो उसका लाभ निश्चित मिलता है। जो भी भक्त पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन करता है देवता प्रदत्त उस नेत्र ज्योति के से जो वात्सल्य मिलता है आशीर्वाद मिलता हैं उस अनुभूति को भक्त जिंदगी भर नहीं भूल पाते हैं।संकलनराजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
