*अन्तर्मना उवाच* (06 जून!)जो हमें बहुत खूबसूरत नजर आ रही है..*वो राहें तबाही के घर जा रही है..!*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच* (06 जून!)जो हमें बहुत खूबसूरत नजर आ रही है..*वो राहें तबाही के घर जा रही है..!*

*जो हमें बहुत खूबसूरत नजर आ रही है..*
*वो राहें तबाही के घर जा रही है..!*

*जिस दिशा में तुम जा रहे हो, वो लक्ष्य विहिन दिशा है।* इसलिए सुबह-सुबह रोज इस बात पर चिन्तन करो –? कि *मनुष्य जीवन पाकर हमें क्या खोना और क्या पाना है–??*

 

 

 

 

पत्नी बच्चे और परिवार के लिए तो सभी कुछ न कुछ करते हैं, कर रहे हैं। मगर इससे तुम्हारे निजी जीवन का, आध्यात्मिक जीवन का, कोई ताल्लुक नहीं है। यह कार्य तो तुम्हारे पिताजी ने भी किया था। इसलिए आप कर रहे हैं। यह सब ऋण है जो तुम उतार रहे हो। जीवन में एक्सचेंज (अदला-बदली) होना ही चाहिए।

 

 

 

इन सबके बावजूद *एक काम ऐसा करना चाहिए, जो तुम्हारे स्वयं के लिए हो, तुम्हारे अपने लिए हो, तुम्हारी अपनी आत्मा की सुख शांति के लिए, और वह काम क्या हो सकता है-? यही कि तुम सुबह-सुबह दो घड़ी का, सामायिक, ध्यान किया करो।* प्रार्थना और प्रभु स्मरण किया करो। स्वाध्याय और दान किया करो,, और सत्संग किया करो। अगर तुमसे इतना भी हो गया, तो समझना तुम्हारा बेड़ा पार हो गया। तुम तर सकते हो। तुम्हारा अगला जीवन इस जीवन से भी बेहतर हो सकता है। और यदि साठ घड़ी में से दो घड़ी यानि 48 मिनट ध्यान ना दिया तो फिर तो यही कहना पड़ेगा —
*मनुष्य जीवन पाकर,*

 

*दिल के अरमां आंसुओं में बह गए…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमडी, 9929747312

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