आस्था का चैनल रत्नत्रय धर्म देव शास्त्र गुरु सात तत्व एवं 6 द्रव्य है उनके प्रति सच्चा श्रद्धान कर पाप कर्म दोष दूर कर सकते हैंआचार्य श्री वर्धमान सागर जी
बांसवाड़ा 
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज बांसवाड़ा की कमर्शियल कॉलोनी में संघ सहित विराजित है आज की धर्म सभा में आचार्य श्री ने प्रवचन में बताया कि हमारे अरिहंत भगवान
वीतरागी,सर्वज्ञ और हितोपदेशी है। जिनवाणी को पढ़कर ,मनन ,चिंतन कर मनुष्य कुल को सार्थक करने का प्रयत्न करना चाहिए आस्था का चैनल रत्नत्रय धर्म है। देव शास्त्र गुरु सात तत्व छह द्रव्य के प्रति सच्चा श्रद्धान कर पाप कर्मों का क्षय कर हमारी कमी और दोष दूर की जा सकती है। हमारे सिद्ध क्षेत्र मंदिरों का संरक्षण जरूरी है भगवान की स्तुति विनय पूर्वक व्याकरण का ध्यान कर शुद्ध बोलना चाहिए । यह प्रभावशाली हितोपदेशी धर्म देशना आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने कमर्शियल कॉलोनी बांसवाड़ा की धर्म सभा में प्रकट की। समाज के प्रवक्ता हिमांशु अनुसार आचार्य श्री ने बताया कि श्रोता को सावधान रहकर जिनवाणी का श्रवण का मनन चिंतन करना चाहिए भगवान की वाणी जिनवाणी कहलाती है जिनवाणी में पूजन से भगवान के प्रति अनुराग और भक्ति प्रदर्शित की जाती है। अरिहंत भगवान ने केवल ज्ञान प्राप्त कर समवशरण में दिव्य देशना से तीन गति के जीवों को देशना दी है भगवान की वाणी को सभी गति के जीव अपनी-अपनी भाषा में समझ लेते हैं। भक्ति का एक उदाहरण बताया कि एक मेंढक महावीर स्वामी के समवशरण में जा रहा था उसके मुंह में फूल पुष्प था हाथी के पैर तले दब कर मृत्यु होने के बाद उसके परिणाम भक्ति के थे ,प्रभु के दर्शन के थे इसलिए वह उस समय मरकर देवगती में उत्पन्न हुआ। यह सब भक्ति का प्रभाव है। पशु भी भगवान की भक्ति पर श्रद्धा कर तीर्थंकर बन जाते हैं ।आप मनुष्य भी सक्षम हो , शास्त्रों में चार प्रकार के पुरुषार्थ बताए गए हैं धर्म पुरुषार्थ ,अर्थ पुरुषार्थ ,काम पुरुषार्थ और मोक्ष पुरुषार्थ ।इसमें धर्म पुरुषार्थ करने से अंतिम मोक्ष पुरुषार्थ करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। श्रावक अर्थ और काम पुरुषार्थ करता है। उसे रत्नत्रय धर्म का अवलंबन लेकर धन का अर्जन संचय करना चाहिए पुण्य नहीं होने पर धन नहीं होता है इसलिए द्रव्य और धन कमाने का तरीका न्याय एवं नीति पूर्वक होना चाहिए न्याय और नीति से कमाया गया धन चिरस्थाई होता है।
आचार्य श्री ने प्रवचन में चिंता व्यक्त कर बताया कि आज धर्म दूर होता जा रहा है। उच्च लौकिक शिक्षा संस्कार के साथ धर्म के साथ करना चाहिए। जीवन को विकसित करने में धर्म का बहुत महत्व है। वर्तमान में पर्यावरण के दूषित होने के चर्चा करते हुए आचार्य श्री ने बताया कि अनेक प्रकार के प्रदूषण पर्यावरण को दूषित कर रहें है चाहे ध्वनि प्रदूषण हो ,प्रकाश प्रदूषण हो ,वायु प्रदूषण हो ,जल
प्रदूषण हो ,राजनीतिक प्रदूषण हो, धार्मिक प्रदूषण हो या सामाजिक प्रदूषण हो ।समाज प्रदूषण के कारण बिखर रहा है संगठित नहीं है इसलिए श्रावकों को धर्म के नियम और उप नियम समझ कर धर्म को धारण करना चाहिए धार्मिक और सामाजिक पर्यावरण धर्म से नियंत्रित होता है तभी आप सुख को प्राप्त करेंगे।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312 
