*अन्तर्मना उवाच* (21 मई!)बाहर से सुलझा हुआ दिखने के लिये..*अन्दर से बहुत उलझना पड़ता है..!*
*बाहर से सुलझा हुआ दिखने के लिये..*
*अन्दर से बहुत उलझना पड़ता है..!*
*आदमी भी कैसा अदभुत प्राणी है?* वह जीते जी कभी शांत नहीं होता, वह कसम खा कर बैठा है, जब तक जिऊंगा, अशांत ही जिऊंगा।
जीते जी कभी शांत नहीं होऊंगा। तभी तो कोई मरता है तो कहते हैं, आज फलां आदमी शांत हो गया। *मैं आपसे कह रहाँ हूँ* — मर कर शांत हुए तो क्या शांत हुए, जीवन की साधना तो यह है, कि तुम जीते जी शांत हो जाओ। *जो जीते जी शांत हो जाता है वह संत हो जाता है, वह मुनि सम हो जाता है, वह ज्ञानी बन जाता है।*।



*मुर्दे* का शांत होना एक *मजबूरी* है, और मजबूरी का नाम *सोनिया गांधी* है। तो तुम जीते जी शांत होने को राजी हो जाओ। मरने के बाद तो मुर्दा शांत होता है। *यदि तुमसे कोई कहे — अरे बाबू कब शांत हो रहे हो? तो आप और अशांत हो जाओगे।*
इसलिए —
*तुम मुर्दा नहीं, तुम जीवंत इंसान हो। अपने स्वभाव में जियो। फिर देखो सुख, शान्ति आनन्द कैसे नहीं बरसता…!!!*। नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
