चंद्रप्रभु को पूजते पूजते खुद चंद्रप्रभु बन गए मुनि श्री चंद्रप्रभसागर महाराज मुनि श्री चंद्रप्रभ महाराज के दीक्षा दिवस पर विशेष
विश्व वंदनीय आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज के परम शिष्य जब से गुरु से दीक्षित हुए तब से एक आहार ,एक उपवास के साधक पूज्य मुनि श्री 108 चंद्रप्रभ सागर महाराज उनके विषय में कहा जाए तो आचार्य गुरुवर के संघ में अगर तपस्वियों की सूची बनाई जाए तो सर्वोत्तम सूची में नाम पूज्य मुनि श्री का आएगा। उनकी ही तपस्या का यह परिणाम रहा की आचार्य श्री के जीवन के अंतिम क्षणों में उन्हें उनका सानिध्य मिला।
इन्हीं के दीक्षा दिवस पर हम उनकी जन्म भूमि और उनके विषय पर जानकारी आप तक साझा कर रहे है। जो हमें परम गुरु भक्त रामगंजमंडी नगर के सिद्धार्थ जैन बाबरिया से प्राप्त हुई।
विवरण चंद्रप्रभु” के वंदन से बने “चंद्रप्रभु”
श्री सिद्धार्थ जैन बाबरिया बताते हैं कि गत दिनों गोवा से मुंबई सड़क मार्ग से जाने का पहली बार मौका लगा।



पश्चिमी घाटों को एक एक करके पार करते हुवे मुंबई पुणे बैंगलोर राष्ट्रीय राजमार्ग पर ही स्तवनिधि अतिशय क्षेत्र के दर्शन का लाभ मिला । स्तवनिधि का उल्लेख अब तक सिर्फ संतशिरोमणि आचार्य गुरुवर श्री विद्यासागर जी महाराज की जीवनी में ही पढ़ा था पर वंदन का लाभ पहली बार मिला । फिर मन में आया की स्तवनिधि से सदलगा ज्यादा दूर तो नही होगा ।
इतनी दूर आए हैं तो सदलगा की वंदना करना तो बनता है । आखिर चलते फिरते तीर्थ हमारे आचार्यश्री का सांसारिक जन्म तो इसी स्थान पर हुआ था ।अतिशयोक्ति होगी यह कहना पर वास्तव में
जन्मकल्याणक सा ही हुआ होगा। क्योकी हमने तीर्थंकर भगवान के साक्षात दर्शन तो नही किए पर पंचम काल के तीर्थंकर सम आचार्य गुरुवर का दर्शन जरूर किया और अनुभूति प्राप्त करी की चौथे काल में तीर्थंकर भगवान का भी ऐसा ही आभामंडल होता होगा पर गुणित रूप में । तो बात आई सदलगा की वंदना की तो याद आया की मेरे गुरु तपोमूर्ति मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज का सांसारिक जन्म का स्थान भी सदलगा से पास ही है । क्या अद्भुत संयोग है न आचार्य श्री और मुनिश्री गुरु शिष्य दोनो कर्नाटक के बेलगाम जिले की
की चिक्कोडी तहसील/तालुका से संबंधित है । आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज एवं मुनि श्री चंद्रप्रभ सागर महाराज के विषय में प्रकाश डालें तो पता लगता है कि दोनो की लौकिक शिक्षा भी चिक्कोडी के एक ही शासकीय विद्यालय में हुई । और एक शिक्षक तो ऐसे भी थे जिन्होंने “विद्याधर”और “शशिकांत” दोनो को अध्यापन कराया है । होना क्या था हम तो हर्षित हो गए।अब स्वनिधि से दोनो हाथो में लड्डू आ गए । पर बिना सारथी के रथ बेकार है ।
सिद्धार्थ बताते हैं कि इसी कोसोच कर मैंने महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के हुपरी में निवास करने वाले मुनिभक्त एवं कर्मठ व्रती श्रावक संतोष जी पाटिल को संपर्क किया और वर्षों से लंबित उनका आतिथ्य स्वीकार किया। सांयकाल में भोजन के पश्चात पूरे परिवार द्वारा पारंपरिक तरीके से हमारी गोद भरी गई । वहां एक बार भी ऐसा नहीं लगा की हम पहली बार यहां आए हैं । बिलकुल अपनापन का अहसास रहा। उसके बाद संतोष जी हमारे सारथी बने और हमारी गाड़ी चली सदलगा की और ।शनै शनै महाराष्ट्र की सीमा से कर्नाटक की सीमा में प्रवेश किया जहां पर बोरगांव आया और उसके पश्चात आया कहानियों और दिल दिमाग में सालो से बसने वाला गांव और अधिक कहूं तो “वर्तमान के अयोध्या समान – सदलगा” । वहां सर्व प्रथम गए “विद्याधर” के जन्मस्थान पर जहां अब मंदिर बन चुका है। बहुत ही सुंदर मंदिर और वहां विराजे सबको शांति प्रदान करने वाले देवाधिदेव शांतिनाथ भगवान | मंदिर के दर्शन के पश्चात नीचे गए जहां पर “विद्याधर” के घर को अब एक संग्रहालय जैसा परिवर्तित कर दिया था पर मूल संरचना में बदलाव किए बिना ।वहां पर एक अलग ही सुख और शांति की अनुभूति थी । वहां का आभा मंडल ही एकमंदिर समान था । हमने पूरे घर को देखा, “विद्याधर ” की वस्तुएं देखी और कल्पना करीकी कैसे गृहस्थ जीवन में हमारे आचार्य परमेष्ठि ने अपना बचपन यहां बिताया । सचमुच में एक गुरुभक्त के लिए गुरु का जन्मस्थान एक तीरथ ही है । वहां से अनेक यादों और विचार को लिए विदा ली और बढ़ चले आगे की ओर ।सदलगा में ही हथकरघा केंद्र संचालित है ।
वहां से हमारी सवारी चली मेरे गुरू उत्कृष्ठ चर्याधारी मुनिश्री चंद्रप्रभसागर जी महाराज केसांसारिक जन्मस्थान यानी “शशिकांत” के जन्मस्थान की ओर, “नेज” – महाराष्ट्र सीमा से सटा हुआ, कर्नाटक राज्य की चिक्कोडी तालुका का एक छोटा सा ग्राम जो की वास्तव इतनाछोटा नहीं था । एक एक जगह आती गई और हम कल्पना करते रहे की यहां कभी “शशिकांत” ने अपना समय बिताया होगा, इन चौपालों पर खेल खेला होगा, इस विद्यालय में अध्ययन करा होगा । अब हमने “शशिकांत” के अनुज भ्राता श्रीकांत जी केंप्राणे से संपर्क किया तो वो हमे लेने आ गए और सबसे पहले ले गए मंदिर दर्शन हेतु । मंदिर बहुत ही सुंदर था । मुख्य मंदिर के बाहर विशाल प्रांगण था जिसमे बहुत ही अद्भुत मानस्तंभ था जो पूरा पत्थर से निर्मित था और वाकई में बहुत ही बेहतरीन कला का नमूना था । इस तरह की बनावट आमतौर पर उत्तर भारत में देखने को नहीं मिलती । वहां से मंदिर जी में प्रवेश किया जो की छोटा था पर साफ सुथरा एवं मनमोहक था । गूढ़मंडप से अंदर की ओर गर्भ गृह में एक वेदी है जहां पर विराजे है चंद्रमा के समान शीतलता प्रदान करने वाले मूलनायक देवाधिदेव चंद्रप्रभु भगवान । जितना छोटा मंदिरबाहर से दिख रहा था उसके मुकाबले मुख्य वेदी बहुत ही भव्य थी । श्रीजी के पीछे भामंडल युक्त परिक्कर पर बहुत शानदार तरीके से स्वर्ण कार्य किया हुआ था जो बहुत ही प्रशंसनीय था।यहीं पर “शशिकांत” पूजन करते होंगे जो पूजन करते करते आज खुद पूज्य बन गए । वास्तविकता तो यही कहती है पूजो उसको जो आप बनना चाहो । “शशिकांत” “चंद्रप्रभु”को पूजते पूजते खुद “चंद्रप्रभ” बन गए । मंदिर को अलग अलग कोने से निहार कर,“शशिकांत” को कल्पित करने लगे और वहां से बाहर निकल गए । फिर श्रीकांत भैया हमे उनके घर ले कर गए जहां पर उनके माता पिता, धर्मपत्नी एवंबच्चो के साथ वे रहते हैं । पुराने मकान को तोड़ कर कुछ वर्ष पूर्व नया मकान बनाया गया है। घर में सबसे मिलकर देखा की “शशिकांत” अपने पिताजी की तरह अटल एवं माताजी की तरह सरल स्वभाव के है । इनके पिताजी 90 वर्ष की उम्र में भी हम से ऐसी गर्मजोशी से मिले की हमे उनकी उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल जान पड़ा । इस उम्र में एकदम तंदुरुस्त है । सादगी एवं सरलता में पूरे परिवार का कोई मुकाबला नहीं । श्रीकांतभैया की बिटिया प्रतिभास्थली जबलपुर से उच्च माध्यमिक शिक्षा ग्रहण कर अपने “शशिकांत काका” के नक्शे कदम पर वकालत की शिक्षा ग्रहण कर रहीं हैं । श्रीकांत भैया की आत्मीयता भी काबिल ए तारीफ है । जब तक मैं 2 दिन बाद घर नहीं पहुंच गया तबतक वो खैर खबर लेते रहे । उस रात भी बड़ी मुश्किल से हमे विदा होने दिया । अब यहां से निकल गए हुपरी की और जहां हमे अपने सारथी संतोष जी से विदा लेनी थी जो उन्होंने बड़ी मुश्किल से दी और साथ में बांध दिया ढेर सारा शुद्ध गुड जो काफी स्वादिष्ट था और व्रती श्रावको के लिए काफी उपयुक्त था । फिर हम निकल गए वहां से सतारा, पुणे होते हुए अपनी मंजिल मुंबई की ओर जहां हम सदलगा और नेज जैसे गुरु तीर्थों की अनेकों यादें लेकर जा रहे थे । इसके साथ ही मन में एक अलग ही खुशी थी की एक दिन में दो महा तीर्थ की वंदना हो गई जो कीअविस्मरणीय हो गई ।
सिद्धार्थ जैन बाबरिया से प्राप्त जानकारी के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी की रिपोर्ट 9929747312
