रोटतीज दिन घर के मुखिया का महत्व समझ आता है
रोटतीज पर्व पर व्रत आदि किये जाते है इसे सामजिक रीती से जोड़कर देखना चाहिये। यह पर्व मुख्यता खंडेलवाल जैन समाज मे ज्यादा प्रचलित है। इस दिन विशेष रोट बनाया जाता है और रस परित्याग पूर्वक उसे खाया जाता है। इसके पीछे जो बड़ी भावना है वो रस परित्याग की है। इसमे एक ख़ास बात होती जिस दिन रोट बनता है उस दिन लोग सिर्फ एक अनाज खाते है रसो का त्याग करके खाते है,उबली हुयी तुरई और बुरा इसके पर्व के पीछे जो सकारात्मक पहलु है की इस दिन घर के मुखिया का महत्व समझ आता है। रोट तीज पर्व पर जो रोट है वो घर की प्रमुख महिला बनाएगी। रोट तीज हमारी चेतना का सवाहक है ।व्यक्ति कही भी हो लेकिन उस दिन घर मे रहकर खाता है। यह पर्व हमारी सामजिक रीती है। रोट तीज जिस दिन होती है उस दिन हम बड़ो को स्मृति मे ला पाते है। हम अगर गोर करे तो हमारे रीती रिवाजो मे मूल्य पलते है। जो लोग नहीं समझ पाते है वो इसका उपहास करते है। हमेसा कुरीतियों का अंत होना चाहिए और रीतियों की रक्षा होनी चाहिए अगर हम हमारी रीतिया खो देगे तो हमारी सांस्कृतिक पहचान मिट जाएगी।

गोर करे तो रोट तीज पर सारा अनाज शुद्ध होता है। उसके पीछे की भावना यही है की हम शुद्ध खाएगे तो आगे 10 दिन भी शुद्ध खाने का मोका मिल जाएगा। बच्चो को भी यह सीख देना चाहिए की यह हमारी रीती है इसे बनाकर रखो रीतीया अगर पलती है तो हमारी संस्क्रति ज़िंदा है
अभिषेक जैन लूहाडीया रामगंजमंडी
