आत्मा-अजर- अमर अविनाशी और शाश्वत है वह में हूं” यह भाव जब अंतरमन में जागता है तो भेदविज्ञान प्रकट होता है” -मुनि श्री प्रमाणसागर

धर्म

“आत्मा-अजर- अमर अविनाशी और शाश्वत है वह में हूं” यह भाव जब अंतरमन में जागता है तो भेदविज्ञान प्रकट होता है” -मुनि श्री प्रमाणसागर

 भोपाल(अवधपुरी)

“वर्तमान युग में हर व्यक्ति भागदौड़,एवं अनावश्यक तनाव और चिंता से ग्रसित होकर जी रहा है, मन में न जाने कितने प्रकार के विचार और विकल्प रोजाना उत्पन्न होते है, आधुनिक युग में सूचनाओं के संसाधनो ने हमारे मन में अनगिनत लहरें उत्पन्न कर दी है, कभी सोशल मीडिया तो कभी फैसबुक, इंस्टाग्राम इंटरनेट के माध्यम से चल रहे अनगिनत ऐप्सों के माध्यम से व्यक्ति दुनिया से तो जुड़ गया लेकिन खुद से कट गया है,और इसीलिये वह तनाव में बना रहता है” 

 

 

 

 

उपरोक्त उदगार मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने विद्या प्रमाण गुरुकुलम् में “भावनायोग का विज्ञान” पर चल रही प्रवचन माला में व्यक्त किये।उन्होंने कहा कि आज हर व्यक्ति दिशाहीन होकर एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, कि वह किधर जायें- क्या करें उसे कुछ पता ही नहीं,उसकी निर्णय क्षमता में बहूत तेजी से कमी आ रही है, समाधान देते हुये मुनि श्री कहते है कि “भावनायोग” एक ऐसा प्रयोग है जो हमें आध्यात्मिक रूप से समुन्नत बनाता है” भीतर से मजबूती और स्थिरता प्रदान करता है,उन्होंने कहा “भावनायोग का संबंध केवल शारीरिक अथवा मानसिक रुप से स्वस्थ रहने तक ही सीमित नहीं है यह हमारी चेतना को परिष्कृत कर आध्यात्मिक रुप से निखार लाता है, उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक रुप से मजबूत व्यक्ती ही शांत,संयत और संतुलित तथा स्थिर होता है।

उन्होंने धार्मिकता और आध्यात्मिकता को स्पष्ट करते हुये कहा कि “धार्मिकता” का मतलब उपासना और पूजा पद्धति से है,लेकिन यह धर्म का एक बाहरी स्वरूप है जबकि असली साधना तो वह अभ्यास है जो हमारीआत्मा को विशुद्ध बनाकर आत्मा और शरीर में भेदविज्ञान उत्पन्न करती है यही हमारी आध्यात्मिक साधना और आत्मोन्नति काआधार है,जिससे हम सुख शांति और प्रसन्नता का अनुभव प्राप्त कर आत्मा की ओर लौटते है यही आध्यात्म है” उन्होंने कहा कि धार्मिक होना और आध्यात्मिक होंने में बड़ा अंतर है।

 

 

 

 

 

धार्मिक व्यक्ती की क्रियायें पुण्य तक ही सीमित होती है जबकि आध्यात्मिक व्यक्ति का ध्येय आत्मशुद्धी से जुड़कर अपने मन को पवित्र करना होता है, “भावनायोग” जब हम करते है प्रार्थना प्रतिक्रमण- प्रत्याख्यान- और सामायिक इन चारों में शारीरिक, मानसिक,संतुलन के साथ सहजोहं, शांतोहं, शुद्धोहं, और सोहं का बार बार उच्चारण करने से अंतरंग की ओर दृष्टि जाती है तथा अपनी आत्मा का अहसास होता है, मुनि श्री ने कहा कि यंहा पर उपस्थित और इस प्रवचन को सुनने वाले सभी धार्मिक हो तभी तो आप सुन रहे हो, लेकिन आध्यात्मिक नहीं,उन्होंने कहा कि “सूचनाओं के संग्रह का नाम ज्ञान नहीं है, अंदर के स्पंदन का नाम ज्ञान है” भावनायोग के माध्यम से शरीर और आत्मा के इस भेदविज्ञान को आप लोगभी अनुभव करके साधना के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते है, लेकिन यह इतना आसान नहीं है, हमारे अंदर जन्मजन्मांतर के संस्कार से हम ऐसे बंधे हुये है कि हम देहभाव से ऊपर उठ ही नहीं पाते हमारा सारा चिंतन शरीर के स्तर तक ही सीमित रह जीता है, जब तक हम अपने स्वरुप का बोध नहीं करेंगे तब तक हमारी प्रवृति में बदलाव नहीं आएगा उन्होंने कहा कि”शरीर नष्ट होता है- उत्पन्न होता है, विचार बनते है- बदलते है,भावनायें प्रकट होती- विनष्ट होती है,लेकिन यह “आत्मा-अजर- अमर अविनाशी और शाश्वत है वह में हूं” यह भाव जब अंतरमन में जाग जाता है तो भेदविज्ञान प्रकट होता है।

उपरोक्त जानकारी देते हुये प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया सोमवार को मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज का मौन के साथ उपवास रहा।

         संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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