अन्तर्मना उवाच*

धर्म

*अन्तर्मना उवाच*

*आज का आदमी भ्रम में जी रहा है, कि बच्चे परिवार मेरे सहारे जी रहे हैं, व चल रहे हैं, मैं बच्चों का भरण पोषण कर रहा हूँ।* मैं नहीं होऊँगा, तो बच्चे दाने-दाने के लिए तरस जाएंगे, पत्नी भूखी मर जाएगी, तुम्हारा भ्रम कुछ चींटी के भ्रम से कम नहीं है-?

 

 

 

एक चींटी को नदी पार करनी थी, नदी पर लकड़ी का पुल था, हाथी ने कहा बहिन मेरे ऊपर बैठ जाओ, मैं उस पार छोड़ दूंगा। चींटी ने कहा हाथी भाई — मेरे बैठने से पुल टूट जायेगा। हाथी हँसने लगा। *शायद चींटी के भ्रम में और आदमी के भ्रम में कोई अन्तर नहीं है।* एक छिपकली कमरे के लेन्टर पर घुम रही थी। हमने कहा — बहिन नीचे आ जाओ। वह बोली — *अरे अन्तर्मना*, यदि मैं नीचे आ जाऊँगी तो पूरी छत आप पर गिर जायेगी। *छिपकली और आदमी के भ्रम में कोई अन्तर नहीं है।*

*आदमी भी यह सोच रहा है कि घर, परिवार, व्यापार, समाज को मैं ही चला रहा हूँ।* मैं नहीं रहूँगा, तो सब कुछ अस्त व्यस्त हो जायेगा। *आदमी सिर्फ निमित्त है, शेष सब अपने अपने भाग्य का ले रहे हैं।* मैं कर्ता हूँ — यही भ्रम आदमी को ना जीने दे रहा है, ना मरने दे रहा है। *कर्म करो पर कर्ता बुद्धि मत रखो…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद

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