*अन्तर्मना उवाच* (25 अप्रैल!)
*लोग क्या कहेंगे-?*
*पहले दिन हँसेंगे,*
*दूसरे दिन मज़ाक बनायेंगे,*
*तीसरे दिन भूल जायेंगे..!*
इसलिए लोगों की परवाह मत करो। *करो वो जो उचित हो, जो तुम चाहते हो और जिसमें आपका मन शांत रहे और चेहरा मुस्कान से भरा रहे।* क्योंकि ज़िन्दगी तुम्हारी है लोगों की नहीं।
*किसी कवि ने लिखा है*–
🔸 दस वर्ष तक बालक चंचल होता है।
🔸 बीस वर्ष की उम्र में बावला पन आ जाता है।
🔸 तीस साल में तीखा पन आ जाता है।
🔸 चालीस वर्ष में फीका हो जाता है।
🔸 पचास वर्ष में पका यानि परिपक्व हो जाता है।
🔸 साठ वर्ष में थका यानि अब भाग दौड़ नहीं होगी।
🔸 सत्तर में बिस्तर यानि बीमारियों का शिकारी बन जाता है।
🔸 अस्सी में लस्सी यानि सब-कुछ सट्ट पट्ट वाला भोजन।
🔸 नब्बे में डब्बा, कोई सुध बुध नहीं रहना।
🔸 सौ में सो गये, पाप बीज बो गये।






यह दुनिया का परम सत्य है। इससे हम अपनी आँखे नहीं चुरा सकते। *लेकिन तुम्हें कुछ कहना यानि (एक) भैंस के आगे बीन बजाना। दूसरा – भैंस के आगे बीन बजाय, भैंस खड़ी पगराए*।
आज का सत्संग प्रेमी या श्रोता ना होकर रेनकोट हो गया है। कितनी ही बरसात हो, पर रेनकोट पर कोई असर नहीं होता है। उसके अन्दर पानी की बून्द भी नहीं जाती। वैसे ही *हम साधु संत रोज प्रवचन, सत्संग करने वाले, उपदेशों की झमाझम बरसात करने वाले, फिर भी तुम्हारे जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आता। क्यों-?* रेनकोट पहन कर सुनने वालों के दिल नहीं भीग पाते। भैंस के बारे में चार बातें, दो बातें ऊपर कह दी,, *तीसरी बात काला अक्षर भैंस बराबर,, चोथा – जिसकी लाठी उसकी भैंस…!!!* नरेंद्र अजमेरा पियुष कासलीवाल औरंगाबाद से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312
