आचार्य विनिश्चयसागर महाराज का मायजा में मंगल प्रवेश, संस्कारों की सीख दी

धर्म

आचार्य विनिश्चयसागर महाराज का मायजा में मंगल प्रवेश, संस्कारों की सीख दी
केशवरायपाटन / खटकड़ |
मायजा गांव में आचार्य विनिश्चयसागर महाराज का रविवार को मंगल
प्रवेश हुआ। गांव पहुंचने पर श्रद्धालुओं ने अगवानी की। आचार्य श्री ने संघ सहित अतिशय क्षेत्र केशोरायपाटन से शनिवार को विहार किया था। लेसरदा गांव के समीप रात्रि विश्राम किया।

 

 

अलसुबह मायजा के लिए विहार कर गए मायजा पहुंचने पर ग्रामीणों ने जगह-जगहपाद-प्रक्षालन और आरती कर आगवानी की।  इसके बाद महाराजश्री की आहारचर्या हुई, जिसमें गांव और बाहर से बड़ी संख्या में समाजबंधु शामिल हुए।

 

 

अपने प्रवचनों में मुनिश्री ने संस्कारों की सीख दी। कार्यक्रम के
दौरान आचार्य विनिश्चय सागर महाराज ने कहा। कि नियमित सामायिक से जीवन धर्म की ओर अग्रसर होता है और व्यक्ति में कल्याणकारी भाव विकसित होते हैं।

 

आचार्य श्री संघ में मुनि श्री 108 प्रांजल सागर महाराज, मुनि श्री 108 प्रवीर सागर महाराज, मुनि श्री 108 प्रत्यक्ष सागर महाराज महाराज एवम क्षुल्लक श्री भी साथ विहार कर रहे हैं। मायजा, रामगंजमंडी,कोटा, बूंदी, खटकड़, अजेता से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओ ने पहुंच कर धर्म लाभ लियाइससे पहले केशवरायपाटन से मंगल विहार के समय समाजबंधुओं ने महाराज श्री को विदाई दी।

संस्कार मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी  आचार्य श्री
आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने प्रवचन में कहा कि संस्कार मानव जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हैं। जैसे बीज में वृक्ष बनने की शक्ति छिपी होती है, वैसे ही अच्छे संस्कार व्यक्ति के भीतर उज्जवल भविष्य की आधारशिला रखते हैं।

महाराज ने बताया कि बच्चों में बचपन में जो आदतें डाली जाती है वह आगे चलकर उनके चरित्र, व्यवहार और जीवन की दृष्टि को निर्धारित करती हैं। उन्होंने कहा कि सत्य, अहिंसा, संयम, करुणा और विनम्रता जैसे संस्कार केवल उपदेश सेनहीं, बल्कि परिवार के आचरण से विकसित होते हैं।

 

 

महाराज श्री ने कहा कि समाज में बढ़ता तनाव, ईर्ष्या और विवाद इसलिए  है, क्योंकि संस्कारों की नींव। कमजोर हो रही है। यदि परिवार और समाज मिलकर बच्चों को सद्भाव,अनुशासन और धर्म की सीख दें तो हरघर में शांति और हर जीवन में उन्नति हो सकती है। उन्होंने संदेश दिया कि अच्छे संस्कार आत्मकल्याण का पहला द्वार है और इन्हें अपनाकर ही जीवन सार्थक बनता है।

 

महाराज श्री ने ने प्रवचन में कहा कि अहंकार मनुष्य के भीतर सबसे बड़ा शत्रु है अहंकार बढ़ने पर व्यक्ति अपने गुणों। से दूर हो जाता है और धर्म मार्ग से भटकने लगता है। उन्होंने बताया कि अहंकार मन में अशांति, क्रोध और वैमनस्य पैदा करताहै, जबकि विनम्रता जीवन को सरल, शांत और मंगलमय बनाती है। महाराज श्री ने कहा कि  सच्चा साधक वही है जो सफलता, ज्ञान  और प्रतिष्ठा मिलने पर भी अपने भीतर नम्रता बनाए रखे।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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