समाधि साधना में कर्म रूपी शत्रुओं से संयम चारित्र रूपी रत्न की सावधानी से रक्षा करना होगीआचार्य श्री वर्धमान सागर जीप्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठी श्री अशोक जी पाटनी आर के मार्बल दर्शन हेतु पधारे

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समाधि साधना में कर्म रूपी शत्रुओं से संयम चारित्र रूपी रत्न की सावधानी से रक्षा करना होगीआचार्य श्री वर्धमान सागर जीप्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठी श्री अशोक जी पाटनी आर के मार्बल दर्शन हेतु पधारे टोंक आचार्य श्री वर्धमान सागर जी संघ सहित श्री आदिनाथ जिनालय नसिया में विराजित हैं।देश के प्रसिद्ध भामाशाह श्रेष्ठि आदरणीय अशोक पाटनी आर के मार्बल किशनगढ़ राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के दर्शन हेतु पधारे और आचार्य श्री ने आशीर्वाद प्राप्त किया स्थानीय समाज के पदाधिकारियों ने इनका सम्मान किया ।मुनि श्री चिन्मय सागर जी को संबोधन में आचार्य श्री ने बताया कि आपको गुरु के द्वारा दिए गए दीक्षा व्रत का पालन करना है चारित्र की विशुद्धता पर प्रमाद आलस्य नहीं करें ।आपका संयम कीमती रत्न है इसकी सुरक्षा करनी है। जीवन का सार चारित्र है। हर समय सजग और सावधान रहना है जीर्ण काया, शरीर में समाधि रूपी विशुद्धता का लक्ष्य ध्यान में रखना चाहिए। हर समय 12 भावना और पांच नमस्कार भाव की आराधना धीरता पूर्वक करें। संघ के सभी साधु आपकी सेवा में तत्पर रहेंगे सभी के प्रति आपको साम्य क्षमा भाव रखना है।यह मंगल देशना में वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दिनांक7 अगस्त को क्षपक मुनि श्री चिन्मय सागर जी को अमृत रूपी वचनों का पान कराया। राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री ने मुनि श्री को संबोधित कर सभी क्रियाएं सजग़ता से करना है, भाव ,परिणाम निर्मल रखने , मृत्यु से भयभीत नहीं होने की प्रेरणा दी।आगे बताया कि रत्नत्रय से सज्जित आत्मा में संकल्प , विकल्प, राग, द्वेष, व्याकुलता को दूर कर अंतरंग परिणाम भावों को संभाल कर देव ,शास्त्र ,गुरु ओर आत्मा की साधना का लक्ष्य रखे।संयम युद्ध के समान है जिसमें कर्म रूपी शत्रुओं पर आपको विजय प्राप्त करना है दीक्षा रुपी मंदिर पर समाधि संलेखना का कलशारोहण करना है।आपने संयम साधना की सफलता की कामना की है।88 वर्षीय मुनि श्री चिन्मय सागर जी ने वर्ष 1989 में आचार्य श्री अजित सागर जी से मुनि दीक्षा ली। आज आपने श्री जी का पंचामृत अभिषेक देखा।श्री जी एवं आचार्य श्री वर्धमान सागर जी से क्षमा याचना कर संस्तरारोहण का निवेदन में बताया कि मेरा शरीर अब संयम साधना में बाधक है इसलिए मेरी संघ सानिध्य में सम्यक समाधि हो आप मुझे भी संसार समुद्र से पार लगा दीजिए। संयम साधना में संबल और मार्ग दर्शन का निवेदन किया ।गुरु और संघ ही माता पिता सब कुछ है।आपने पुनः आचार्य श्री सहित सभी मुनिराज आर्यिका माताजी से क्षमा याचना की।सभी ने मुनि श्री चिन्मय सागर जी से नमोस्तु कर क्षमा ली।इसके बाद आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कमरे की मंत्रोच्चार पूर्वक शुद्धि की। इस अवसर पर काफी श्रद्धालुओं ने आपके जयकार लगाकर संयम तपस्या की अनुमोदना की। 

 

संस्तरारोहण अर्थात क्षपक साधु जिस स्थान पर बैठते ,लेटते हैं उसे संस्तर कहते हैं और उस पर बैठना, उठना आरोहण कहलाता है इस प्रकार संस्तरारोहण किया जाता है। मुनि श्री जीवित अवस्था में संयमी जीवन में क्रम पूर्वक आहार का त्याग कर रहे हैं ।राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी 9929747312

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