नगर गौरव ब्रह्मचारी रीना दीदी के जन्मदिन पर विशेष
रामगंजमंडी
सादर सहर्ष यह शब्दस्रक् आदरणीया बाल ब्रह्मचारिणी रीना दीदी की ग्रीवा को अलंकृत करते हुए अप्राकृतिक मद प्रवाहित कर रही है। यह रामगंजमंडी के “नगर गौरव”* के रूप में ख्यातिलब्ध हैं।
और हिंदी में जैसी सूक्ति है कही जाती है कि चरण नहीं आचरण छुए इन्होंने इस सूक्ति को चरितार्थ करते हुए उस मंजिल को प्राप्त किया है जिसे प्राप्त करना हर किसी के वश में नहीं होता। 
इन्होने संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज जी से प्रतिमा के व्रत ग्रहण किए हैं। इनके पिताश्री गणेशलाल ज जैन और माताश्री संतोषबाई जैन का पुण्य का उदय था कि इन जैसी पुत्री को उन्होंने प्राप्त किया। वस्तुत: संसार में बच्चे अपने माता पिता से धर्म के संस्कार सीखते हैं पर इनके परिवार में धर्म की वास्तविक सुंगध आपके ब्रह्मचर्य व्रत लेने के बाद फैली और इनके धर्म मार्ग पर जाने से इनके परिवार जन और माता पिता भी धर्म मार्ग को प्रशस्त कर रहें है। इनके द्वारा ग्रहण किया हुआ संयम मानों आत्मीयों के लिए संजीवनी सिद्ध हुआ है। इनके के माध्यम से प्रतिजन को स्वाध्याय द्वारा ज्ञानदान प्रदान किया जाता है।







वर्तमान में यह सर्वकारीय विद्यालय में गणित विषय की शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही है।सभी बच्चों के भविष्य को उस आयाम तक पहुँचा रही हैं जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।
इनका दैनिन्दन जीवन धार्मिक क्रियाओं से ओत -प्रोत रहता है।
इनके धार्मिक स्वभाव और सदाचार का ही प्रभाव है कि आज इन्होने अपने जीवन में छोटी सी आयु में इतनी कीर्ति अर्जित की है जो कि स्तुत्य है।
इनके जीवन की धार्मिक उन्नति में मुख्य निर्देशन परम पूज्य विनीत सागर जी और चंद्रप्रभ सागर जी महाराज का है। इन्होने रामगंजमंडी में पूज्य मुनिद्वय के चातुर्मास के समय जो गुरूसेवा की उसके परिणाम स्वरुप इनको पूज्यमुनि श्री विनीत सागर जी महाराज की पिच्छिका भी प्राप्त हुई।
यह प्रतिवर्ष ग्रीष्मकाल में अपना पूरा समय आचार्य संघ के श्री चरणों में व्यतीत करती रही है। इस वर्ष इन्होने ग्रीष्मकाल में अपनी सबसे प्रिय सखी श्रीमती रेखा बाबरिया के साथ चंद्रगिरी क्षेत्र डोंगरगढ (छतीसगढ़) गईं और इन्होने अत्यंत महान् पुण्योदय से आषाढ़ शुक्ल षष्ठी के दिन पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी के 56 वें दीक्षा दिवस पर इनको नवधाभक्ति पूर्वक आहारदान का पुण्यलाभ प्राप्त हुआ। इनके इस स्वर्णिम दिवस को अविस्मरणीय बनाते हुए आचार्य श्री के समक्ष दूसरी प्रतिमा(व्रत प्रतिमा)के व्रतों को सहर्ष अंगीकार करते हुए चिरकाल तक स्मृति पटल पर अंकित करने का उद्यम किया है।

इन्होने व्रत प्रतिमा को आत्मार्पित करके निश्चित ही उस अमूल्य रत्न को प्राप्त कर लिया हैं जिस रत्न का मूल्य प्रतिसमय बढ़ता ही जाता हैं।
इन्होने जैन कूल में जन्म और मनुष्य भव की दुर्लभता को समझते हुए स्वकल्याण के साथ साथ परकल्याण का जो यह अभूतपूर्व मार्ग चुना है वह निश्चित ही अनुसरणीय हैं।
आज हम सभी आपके इस जन्मदिन के अवसर पर आज तक इनके द्वारा प्राप्त सौभाग्य की भूरि भूरि अनुमोदना करते हैं। वस्तुत: हम सभी इनके जैसे व्रती के सम्मान में कुछ भी शब्द अर्पित करने के योग्य नहीं हैं तथापि जैसा कि कहा है-
“अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानां तु विमानना।”*
“त्रीणि तत्र प्रवर्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयं ॥
तदनुसार हम सभी इनके जैसे संयमी बन सकें इस हेतु आज इनके जन्मदिन के उपलक्ष्य पर इन्हे अनंत शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे हैं
हम सभी भावना भाते है कि यह शीघ्र ही स्वयं कल्याण पद को प्राप्त करते हुए हम सभी के कल्याण के पथ को उद्घाटित करें और हम सभी पर अपना वात्सल्य ऐसे ही बनाएं रखें।
“अचिरान् मोक्षं प्रपद्यताम् इति भावनया इदं प्रशस्ति पत्रं समर्प्यते।”
प्रशांत जैन आचार्य के शब्द सुमन के साथ अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
