पूज्य समय सागर महाराज को आचार्य पद पर आसीन किए जाने के कई मायने
परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर महाराज 11 फरवरी 2024 को ब्रह्मलीन हो गए लेकिन वह ऐसी निधि दे गए जो युगों युगों तक अविस्मरणीय रहेगी।
वे बता गए की गुरुकुल की पद्धति क्या होती है और संघ का अनुशासन क्या होता है। आचार्य श्री कहा करते थे की संघ को गुरुकुल बनाना है। वैसा ही उनके बाद भी देखने को मिल रहा है। उन्हीं के द्वारा प्रथम दीक्षित शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समय सागर महाराज को गुरु आज्ञा अनुसार आचार्य पद प्रदान किया जाएगा।




उन्हें आचार्य पद प्रदान किए जाने के कई मायने हैं। वे कई वर्षों तक गुरु के साथ रहे। और उन्होंने गुरु के साथ रहकर काफी कुछ जाना है। यहां तक कि जब समस्त संघों के आदेश चातुर्मास आदि के लिए विहार आदि के निर्णय दिए जाते थे तब समय सागर महाराज उसमें अहम भूमिका निभाते थे।
और भी कही मायने है – आचार्यश्री के प्रथम दीक्षित शिष्य हैं तो पहला आधार तो सबसे वरिष्ठ शिष्य हैं। जब वे चंद्रगिरी तीर्थ पर गुरुवार की बेला में पहुंचे और उन्होंने अपना उद्बोधन दिया तब प्रतीत हुआ कि उनमें आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जैसी दूरदर्शिता है और गहनता एवं गहराई है।
उनके प्रवचन उनकी वाण शब्दों में भी आचार्य श्री जैसी ही गहनता और गहराई है। अधिकांश साधु अपना शोक प्रकट करने में अपनी भावनाओं को छुपा नहीं सके लेकिन पूज्य निर्यापक श्रमण मुनिश्री समय सागर जी का एक वीतरागी की तरह स्वयं पर और अपने शब्दों पर पूर्ण नियंत्रण है। और उन्होंने राग के विषय में जो समझाया वह यह बताता है कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की परंपरा आज भी जीवंत है और जीवंत रहेगी एवम श्रमण परंपरा सदा सदा अक्षुण्ण रहेगी।
अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
