आचार्य श्री का मन पहले अपनी गुरु आचार्य ज्ञान सागर के पास था लेकिन देह विसर्जन करने के समय निर्यापक मुनि समय सागर जी के साथ रहा विनम्र सागर महाराज

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

आचार्य श्री का मन पहले अपनी गुरु आचार्य ज्ञान सागर के पास था लेकिन देह विसर्जन करने के समय निर्यापक मुनि समय सागर जी के साथ रहा विनम्र सागर महाराज
सागर
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनि श्री 108 विनम्र सागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन कृतित्व पर प्रकाश डाला कई ऐसे संस्मरण एवं उनके विषय में बताते हुए कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने विहार के दौरान कहा कि सोचने से कहां मिलते हैं, तमन्नाओं के शहर, मंजिल पाने के लिए चलना भी जरूरी होता है।

 

मंजिल पाने के लिए बढ़ना, चलना, गलना, और गिरना पड़ता है, गुरुदेव कितना बढ़े, यह सब आपने देखा है। वे अपनी देह का विसर्जन करके गए हैं।

 

 

 

उन्होंने कहा कि आचार्य श्री का मन पहले अपने गुरु आचार्य ज्ञान सागर जी महाराज के पास था, लेकिन देह विसर्जन करते समय निर्यापक मुनि श्री समय सागर जी के साथ रहा। गुरुदेव ने जो ज्ञान सभी मुनिराजो को दिया है। अब जिन शासन और अच्छा चलेगा सम्यकत्व के साथ ज्ञान अलग और चारित्र के साथ जो ज्ञान प्राप्त होता है उसमें बहुत अंतर होता है।

उन्होंने कहा आचार्य श्री ने 55 साल से अधिक की साधना की है समाधि 1 दिन का काम नहीं था बच्चों की साधना होती है। मन वचन काय के साथ समता भाव की बात वह हमेशा करते थे महान साधक के जो 55 साल निकले हैं इतनी ऊंचाई पर पहुंचकर दूसरा कोई खाई में पहुंच जाता है लेकिन ऊंचाइयों पर होकर भी और ऊंचाईयो पर चले गए। मुनि दीक्षा के समय आचार्य ज्ञान सागर को देखकर आचार्य श्री ने उसी दिन तय कर लिया था कि जीवन में नमक और शक्कर नहीं लूंगा। मुनि बनने के पहले ही लगभग सभी प्रकार के त्याग कर दिए थे। उन्होंने कहा कि तृष्णा वर्तमान में जीने नहीं देती और भविष्य की लालसा बनी रहती है। मुनिश्री ने कहा उन्हें ना वर्तमान की इच्छा थी ना भूत भविष्य की।

महाराज श्री ने एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि एक बार आहार लेते समय किसी श्रावक ने अनार रस दिया और कहा कि गुरुदेव के हाथ गुलाबी हैं, और रात भी गुलाबी है। उस दिन के बाद गुरुदेव ने अनार का आजीवन त्याग कर दिया। इसी प्रकार 2010 में बहोरीबंद में दूध का त्याग कर दिया था।

 

महाराज श्री ने आगे बताया कि उसके बाद से शरीर को झटका लगने लगा लेकिन गुरुदेव ने नियम लिया तो उसे कोई बदलवा नहीं सका। लगभग 45 मिनट की प्रवचन के दौरान समस्त मुनि संघ, आर्यिका संघ और श्रद्धालु भाव विहल होकर करके आंसू बहाते रहे।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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