.तब आहार लगाते ही निकलने लगी चींटियां…अचानक हुई गायब
-डीग जिले के कामां का भी रहा है संत आचार्य विद्यासागर का नाता
भरतपुर.
डीग जिले के कामां का भी संत आचार्य विद्यासागर महामुनिराज से पुराना नाता रहा है। उनके संल्लेखनापूर्वक समाधि की खबर ने जैन समाज के लोगों की पुरानी यादों को ताजा कर दिया। जब 49 साल पहले संत आचार्य विद्यासागर महामुनिराज कामां आए थे। जहां करीब 10 दिन तक उनका प्रवास रहा था। उस समय वह हिंदी अच्छी तरह से नहीं बोल पाते थे, लेकिन कर्नाटक की कन्नड़ भाषा का उपयोग अधिक करते थे।
बताते हैं कि आचार्यश्री विद्यासागर की मुनि दीक्षा 30 जून 1968 को अजमेर में हुई थी। वर्ष 1968 से वर्ष 1974 तक 6 वर्षायोग राजस्थान में 4 जगह अजमेर, किशनगढ़, ब्यावर व नसीराबाद में चातुर्मास हुए। मुनि विद्यासागर को आचार्य पद 22 नवंबर 1972 में नसीराबाद में मिला था। मई 1975 में वे कामां के कोट ऊपर स्थित आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर पहुंचे थे। जहां उनका 10 दिन तक प्रवास रहा था। 
कामां के संजय जैन बडज़ात्या ने बताया कि उस समय की एक घटना आज भी जैन समाज में किसी चमत्कार से कम नहीं है। सुमतचंद ओमप्रकाश जैन बडज़ात्या के घर पर उनकी आहार चर्या हुई थी। कर्पूरी देवी, कमला जैन बडज़ात्या ने आहार निवास पर लगाया तो ढेर सारी चींटिंयों का समूह आहार के आसपास निकलने लगा। इससे परिजन घबरा गए। इतनी ही देर में आचार्य श्री विद्यासागर महामुनिराज पहुंचे तो चींटियां गायब हो गई। मतलब एक भी चींटी वहां नहीं थी। हालांकि कामां में प्रवास के बाद वे उत्तरप्रदेश के बरसाना की ओर निकल गए। जहां उन्होंने उत्तरप्रदेश के फिरोजाबाद शहर में चातुर्मास किया था।
कामां से विहार के बाद राजस्थान वासियों की अखियां अपने गुरुवर को पुनः राजस्थान लाने के लिए तरसती रही। किंतु गुरुवर राजस्थान की धरा पर नहीं आए वहीं अजमेर के नारेली का मंदिर आज भी आचार्य विद्यासागर की बाट जोह रहा है।
चेहरे पर होता था तेज, हर समय प्रसन्न
कामां में जैन समाज के लोगों ने बताया कि संत आचार्य विद्यासागर महामुनिराज के चेहरे पर हमेशा तेज झलकता था। उनसे आंख मिलाना भी मुश्किल था। वह हर समय प्रसन्न दिखाई देते थे। हर सवाल का बड़ा ही सटीक जवाब उनके व्यक्तित्व को बताता था। हालांकि उन्होंने उस समय राजस्थान से ही हिंदी सीखना आरंभ किया था।
गर्मी में भी पंखा तक नहीं चलाते थे
बताते हैं कि उस समय आचार्य श्री मई माह में आए थे और उस समय गर्मी का सीजन शुरू हो गया था, लेकिन इतने साधारण तरीके से साधना में रहते थे कि पंखा तक उपयोग नहीं करते थे। भीषण सर्दी-गर्मी में कपड़ा, कंबल, चटाई, रजाई, पंखा, कूलर, हीटर और एसी आदि का उपयोग नहीं करते थे। लकड़ी के पाटे पर ही बैठकर सुबह से शाम हो जाती थी। वे महज तीन से चार घंटे की अल्प निद्रा लेते थे। शेष समय ध्यान में लीन रहते थे। नमक, गुड़, फल, सब्जी, सूखे मेवे और दूध का त्याग होने के बाद भी आचार्य श्री हमेशा स्वस्थ दिखाई देते थे।
मूकमाटी की उत्कृष्ट रचना के साथ-साथ उन्होंने गो संवर्धन और हथकरघा उद्योग के लिए विशेष कार्य किया। लोगों को रोजगार प्रदान करने की भूमिका में यह उद्योग बड़ा ही सफल रहा इसके साथ-साथ आचार्य श्री ने विद्यास्थली जैसे बड़े विद्यालयों की स्थापना की जिसमें सभी शिक्षा ग्रहण कर सकें। उनका मनोबल,उनकी वैचारिक क्रांति, उनकी दूरदर्शी सोच सब कुछ उन्नत थे । उन्होंने इंडिया नहीं भारत बोलो का नारा दिया जो कि वर्तमान में साक्षात स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है भारत सरकार के द्वारा सीबीएसई की नवीन पुस्तकों में इंडिया शब्द को हटा दिया गया है।विद्यासागर महाराज एक ऐसे संत थे जिन्हें जैन समाज ही नहीं अन्य समाजों के द्वारा भी स्वीकार किया गया उन्होंने सबके उत्थान के लिए कार्य किया।
भारतवर्ष के जैन संतों में केवल एक ऐसे जैन संत विद्यासागर ही हुए जिन्हें मात्र आचार्य श्री के नाम से ही पहचाने जाने लगा। उनकी वाणी का प्रताप ऐसा था कि जो एक बार श्रवण कर ले वह उनका ही होता चला जाता था उनके दर्शनों को इतनी लालसा रहती थी कि जैसे भगवान की झलक दिखलाई दे रही हो। कई बार दर्शन करने का सौभाग्य मिला तो लोगों को यह कहते हुए Hurt कि आज तो तीन बार दर्शन हो गए, आज तो पांच बार दर्शन हो गए आज तो दर्शन करके मैं धन्य हो गया। ऐसे संयम पथ के अनुगामी योगीश्वर, वर्तमान के महावीर जिन्हें धरती के देवता की संज्ञा दी जाती है की विदाई पर हम सब उन्हें अश्रु पूरीत श्रद्धांजलि दे रहे हैं ओम शांति शांति शांति
संजय जैन बडजात्या कामां से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
