जब मैं चार या 5 वर्ष का था तब आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ग्रहस्थ अवस्था के विद्याधर गृहस्थ छोड़कर संन्यास की ओर चले गए थे योग सागर महाराज
डोंगरगढ़
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के परम शिष्य एवम उनके गृहस्थ अवस्था के भाई पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि 108 योग सागर महाराज ने आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज के विषय में जानकारी देते हुए वह गुरु के प्रति भाव प्रकट करते हुए उन्होंने एक संस्मरण को बताया की उन्होंने कहा कि जब मैं चार या 5 वर्ष का था तब तब आचार्य गुरुवर गृहस्थ अवस्था को छोड़कर संन्यास की ओर चले गए थे।
उन्होंने कहा कि हमारे सांसारिक भाई एवं वर्तमान में निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 समय सागर श्रीजी महाराज हम दोनों खेल रहे थे तभी उसी समय विद्याधर जी आए, और हमसे कहा आप लोगों को नवकार मंत्र आता है, हम चुप रहे, क्योंकि हमें नहीं आता था।

उसके बाद उन्होंने हमें नवकार मंत्र सिखाया। इसके बाद उन्होंने भूत भविष्य वर्तमान की चौबीसी के नामों को याद कराया और कहा प्रतिदिन इसकी माला फेरना और इनका नाम लेना हम रात को सोने से पहले माला फेरते। महाराज श्री योग सागर महाराज कहते हैं।








की प्रतिदिन यह करते-करते इतनी लगन बढ़ गई की हम अगर पिक्चर देखने जाते तो सबसे पहले क्रिया करते फिर पिक्चर देखने जाते। ऐसा इसलिए करते थे कि पिक्चर देखने जाएं देर हो जाए तो क्रिया करना ना भूल जाए। इतनी उन्होंने धार्मिक शिक्षा दी। इसी पुण्य अर्जन के कारण यहां आया हूं।
उन्होंने एक और संस्मरण सुनाते हुए कहा कि मैं जब 19 वर्ष का था तब सन 1975 में क्षुल्लक दीक्षा को ग्रहण किया था। इसके बाद सन 1980 में मुनि दीक्षा को ग्रहण किया था। मुनि श्री ने कहा कि अगर मैं भाई बन कर रहता तो वो रखेंगे। यदि वह मुझे भाई मानकर रखते तो मैं उन्हें प्रणाम नहीं करता। यहां पर भाईचारे को मिटाना है। संसार से यह सारे रिश्ते हटाने के लिए दिगंबर बनना है। मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री ने लगभग 10 वर्ष पूर्व ही सभी शिष्यों को अपनी जिम्मेदारी सौंप दी थी जैसे एक पिता अपने बेटे को चाबी सौंप देता है। उसी प्रकार यहां भी दी थी।
उन्होंने आचार्य श्री के संदर्भ में कहा कि आचार्य श्री के शुरू से ही वैराग्य था, 60 70 वर्ष पूर्व एक ऐसे संत में है आचार्य श्री शांति सागर महाराज उनके उपदेश को सुनकर 9 साल की उम्र में ही उन्हें भेद ज्ञान हुआ, वैराग्य हुआ था। वही वैराग्य धीरे-धीरे बढ़ता गया। और 20 साल बाद घर छोड़े, उन्होंने बताया कि घर का ऐसा संस्कार था कि
उनको भक्तावीर सूत्र और जिन सहस्त्रनाम पिताजी ने सिखाया। वह कहते थे, जो ये याद करेगा, सामने मेला आ रहा है उसको अठन्नी व रुपया मिलेगा। पिताजी हममें धार्मिक भावना, जागृति करने हमें प्रोत्साहित करने ऐसा किया करते थे।
उन्होंने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज 16 वर्ष की उम्र में कन्नड़ भाषा में ही उपदेश देते थे। लोग उन्हें बुलाने आते थे। वह दोस्तों के साथ प्राय पंचकल्याणक में भाग लेने जाते थे। इसके अलावा वे घरेलू कार्य भी किया करते थे। लेकिन उनकी रूचि धार्मिक कार्यों में ज्यादा हुआ करती थी।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
