आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की एक-एक अक्षर और शब्द जीवंत थे, है और रहेंगे दृढ़मति माताजी

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की एक-एक अक्षर और शब्द जीवंत थे, है और रहेंगे दृढ़मति माताजी
सागर
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के विषय में बोलते हुए आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की परम शिष्या आर्यिका 105 दृढ़मति माताजी ने कहा की आचार्य श्री विद्यासागर महाराज दीक्षा सम्राट थे । उनके बोले एक-एक अक्षर और शब्द जीवंत थे, है, और रहेंगे।

 

आचार्य श्री के जो जीवन सूत्र मिले थे वे और आगे के सूत्र भी हम सभी को दिए हैं। माताजी ने अपने दीक्षा की पूर्व के समय को स्मृति में लाते हुए कहा कि दीक्षा के पूर्व सन 1987 में मैंने एमए की पढ़ाई के लिए गुरुदेव से पूछा तो गुरुदेव ने जवाब दिया कि अब शिक्षा में एमए नही आत्मा की एमए करो। और कुछ दिनों बाद दीक्षा हो गई। पूज्य माताजी ने यह बात अपने 38 में दीक्षा दिवस पर भाग्योदय तीर्थ में कहीं।

माताजी ने कहा कि गुरुदेव ने मात्र शिक्षा ही नहीं, बल्कि शिक्षा पद्धति भी दी है। शास्त्र नहीं बल्कि शास्त्र स्वाध्याय पद्धति दी है। ज्ञान नहीं, बल्कि समीचीन ज्ञान दृष्टि दी है।

 

 

सम्यक दर्शन की परिभाषा के साथ लाखों लोगों को सम्यक दर्शन प्रदान किया है।

 

 

 

उन्होंने आगे कहा कि यह नश्वर शरीर देव शास्त्र गुरु के काम नहीं आया तो किस काम का है। आचार्य श्री ने कहा था जीवन के अंतिम समय तक अपने गुरुदेव के सूत्रों को याद करते रहो और कहा कि पंचायत मत किया करो बल्कि पंच परमेष्ठी भगवान की आराधना करो। इसके बाद तुम्हारा बचे तो मुझसे कहना। गुरु के उपकार को में कभी नहीं भूल सकती हूं। सन 1980 की एक बात बताते हुए माताजी ने कहा कि सन 1980 में आचार्य श्री ने कहा था मैं सिद्ध भी बन जाऊंगा तो अपने गुरु के उपकारों को भूल नहीं पाऊंगा। हम मुनि और आर्यिका का संघ भी आचार्य भगवान के उपकारों को अपने जीवन में कभी भूल नहीं पाएंगे। एक बार आचार्य श्री ने अपने प्रवचन में कहा था गधे के गले में चैन नहीं रहता है। पर वह चैन से रहता है। आदमी के गले में कई चैन रहती है। पर वह चैन से नहीं रहता है। आर्यिका माताजी ने कहा आचार्य श्री के दर्शन करने पहली बार जब गए थे तो उनसे पूछा कि आचार्य श्री क्या करें तो उन्होंने सीधे कहा आर्यिका बनो। जब मैं घर पर रहती थी। मेरा ब्रह्मचर्य व्रत भी नहीं था, मैंने पूछा कहां से शुरू करें। तब आचार्य श्री ने कहा सबसे पहले चलचित्र का त्याग करो। और 1987 में आर्यिका दीक्षा दी।

संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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