आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को को विनयाजली प्रकट करते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर महाराज ने कहा सन 1968 में शरद पूर्णिमा पर जन्मे एक नक्षत्र का समाधि मरण श्रमण संस्कृति के नक्षत्र का अस्त अवसान समाज साधुओं के लिए अपूरणीय क्षति है।सीपुरसंत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के समाधि मरण पर प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने श्रद्धांजलि में कहा कि सन 1968 में शरद पूर्णिमा पर जन्मे एक नक्षत्र का समाधी मरण श्रमण संस्कृति के नक्षत्र का अस्त अवसान समाज साधुओं के लिए अपूरणीय क्षति है यह मंगल उद्बोधन अतिशय क्षेत्र सीपुर प्रवेश पर आयोजित श्रद्धांजलि सभा में प्रकट किए । बाल ब्रह्मचारी गजू भैय्या, नितिन भैय्या ,राजेश पंचोलिया अनुसार आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का पारसोला पंच कल्याणक लिए विहार चल रहा है सीपुर अतिशय क्षेत्र में आगमन हुआ आचार्यश्री विद्यासागर जी महाराज के समाधि मरण अवसर पर धर्म सभा में आचार्य श्री ने बताया कि आपने 77 वर्ष के जीवन में 56 वर्ष के दीक्षा काल में आपने आचार्य श्री शांति सागर जी के प्रथम मुनि शिष्य श्री वीर सागर जी उनके प्रथम शिष्य मुनि श्री शिव सागर जी के प्रथम शिष्य मुनि श्री ज्ञान सागर जी से प्रथम मुनि शिष्य के रूप में दीक्षा ली। इस कारण आचार्य श्री विद्या सागर जी का प्रथमाचार्य श्री शांति सागर जी की परंपरा से निकट का संबंध है। आचार्य श्री विद्या सागर जी ने अनेक भव्य जीवों को दीक्षाएं दी ।नए तीर्थो का निर्माण करवाया।
अनेक नगरों में ,क्षेत्र में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराई शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिभास्थली के माध्यम से बच्चों को संस्कारित करने के लिए प्रेरणा से कार्य प्रारंभ कराया। साहित्यिक जगत में जैन धर्म में अनेक ग्रंथों, रचनाओं का निर्माण हुआ। आचार्य श्री विद्यासागर जी ने आचार्य पद में बहुत कार्य किया विशेष कर बुंदेलखंड क्षेत्र में कुंडलपुर सहितआपने काफी कार्य कराए। हमारे आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने एक प्रसंग में बताया कि सन 1971 किशनगढ़ में आचार्य ज्ञान सागर जी और मुनि श्री विद्यासागर जी विराजित थे, हमें भी हमारे दीक्षा गुरु तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री श्री धर्म सागर जी के साथ किशनगढ़ जाने का अवसर मिला तब दोनो आचार्य ,आचार्य संघ के साधुओं का आपस में मिलन हुआ ।15 दिन से अधिक समय किशनगढ़ में दोनों संघ आपस में स्वाध्याय, अभिषेक देखना ,और साथ में ही आहारचर्या पर उठते थे। दूसरी बार नसीराबाद में भी श्री विद्यासागर जी महाराज से मिलन हुआ।आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपनी भावांजलि में बताया कि आचार्य विद्यासागर जी ने अपने दो भाइयों को मुनिश्री समय सागर जी और मुनिश्री योगसागर जी के रूप में दीक्षित किया ।आपके गृहस्थ अवस्था के पिता माता और दो बहनों ने आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज से मुनि दीक्षा एवं आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। बाद में आचार्य श्री विद्यासागर जी ने कुछ वर्षों पूर्व अपने बड़े भाई श्री महावीर जी को भी मुनि दीक्षा प्रदान की ।अन्य संस्मरण में आचार्य श्री ने मुनि श्री योगसागर जी का जिक्र कर बताया कि सन 1993 में हम श्रवण बेलगोल महामास्तकाभिषेक के लिए गए तब 8 माह तक लगातार मुनि श्री योग सागर जी महाराज हमारे संघ सानिध्य में ही स्वाध्याय करते थे आहारचर्या पर जाते थे और उन्होंने भी हमारे को उतना ही सम्मान दिया जो अपने दीक्षा गुरु को देते हैं।उन्होंने बताया कि हमे हमारे गुरु की कमी महसूस नही हुई। भारत देश के अनेक राज्यों में भ्रमण के समय आचार्य श्री विद्या सागर जी के अनेक मुनिराजो आर्यिका माताजी ने हमारे दर्शन किए। आपने अनेक संस्मरण में बताया कि हमारा विगत अनेक वर्षों से मिलन नही हुआ तब भी दोनो संघों में प्रेम वात्सल्य बना रहा। 18 फरवरी को सीपुर प्रवेश के बाद नगर के प्राचीन दिगंबर मंदिर के दर्शन किए। सीपुर से सलूंबर होते हुए पारसोला के लिए विहार होगा राजेश पंचोलिया इंदौर से प्राप्त जानकारी संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
