आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की समाधि की सूचना सुन गणिनी आर्यिका विशुद्ध मती माताजी ससंघ हुआ स्तब्ध

आचार्य श्री विद्यासाग़र महाराज

आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की समाधि की सूचना सुन गणिनी आर्यिका विशुद्ध मती माताजी ससंघ हुआ स्तब्ध

 

गुरु मां विशुद्ध मति माताजी ने आचार्य श्री के प्रति अपने भाव प्रकट हुए कहा संतो में संत महासंत आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज की समाधि से सभी जगह शोक की लहर है।

मृत्यु एक सत्य है। लेकिन एक महामना की समाधि एक अमूल्य क्षति है। यह सूचना सुन गणिनी गुरु मां 105 विशुद्ध मती माताजी एवं विज्ञ मति माताजी ससंघ स्तब्ध है। संपूर्ण संघ में शोक की लहर छाई हुई है। ऐसे महामना का महाप्रयाण एक अमूल्य क्षति है। जिसकी रिक्तता को भर पाना काफी मुश्किल है। आचार्य श्री जन जन के संत थे वे आत्म साधक थे, प्राणी मात्र के प्रति करुणा, वह मानवता के उद्घोषक थे। कहां जाए तो वे साधना के सतत प्रहरी थे। स्वभाव के निर्मल लेकिन अपने नियमों के प्रति गुरुदेव कठोर थे। अनुशासन ही उनके जीवन का प्रमुख आधार था उन्होंने श्रमण परंपरा को जीवन दिया या यू कहे तो आचार्य श्री श्रमण परंपरा के जीवंत प्रमाण थे।

 

माताजी ने कहा…..कि एक आत्म साधक के लिए जीवन का अंतिम लक्ष्य होता है सल्लेखना पूर्वक समाधि जो आचार्य श्री के जीवन के अंतिम क्षणों में देखने को मिला। गुरुदेव सचमुच साधना के सुमेरू थे। अंत मैं समस्त संघ की और से गुरुदेव के चरणों में भाव भीना नमन और यही भावना है की पूज्य आचार्य श्री 108 विद्या सागर जी महामुनिराज को सिद्धत्व की प्राप्ति हो।

अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी

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