आचार्य गुरुवर विद्यासागर महाराज के परिषह जीवंत दर्शन अवशेष जैन जबलपुर की शब्द शिल्प स्वर रचना के बोल
कुंदन से तपे हुए तन को गुरु ने कितना झुलसा डाला
उपदेश सुनाते बहुत मगर गुरु ने जीवंत दिखा डाला
चेतन से भिन्न तेरा ये तन,चेतन से भिन्न सदा ये तन,विद्यासागर गुरुदेव नमन …
गुरुदेव नमन गुरुदेव नमन…
वर्षों से त्याग है षटरस का,गुरुदेव बाल ब्रहमचारी बने
शुद्धात्मा दिगंबर चर्या के निज आत्म के प्रबल पुजारी बने
विश्राम ना लें क्षण भर का कभी चितवन चिंतन का सागर है
है कृपा दृष्टि करुणा निधि की, गुरु वचनामृत गुण गागर हैं , चेतन से भिन्न तेरा ..


अनियत विहारी हैं गुरुवर, परिवार भी संयम धारी है
हैं शिष्य सकल भारत भू पर सर्वाधिक दीक्षा धारी है
गुरु कुंद कुंद के कुंदन से शीतल इतने जो चंदन हो
निष्काम व्रत नियम धारी को जग करता नित नित वंदन हो चेतन से भिन्न तेरा …
लावण्यमयी काया का क्या ,ना मोह कभी इसका करना
जग का जग को सब छोड़ दिया अपरिग्रह भव सदा रखना
संयम व्रत के महा साधक के ,आराधक शुद्ध निरंजन हैं,
हे तपोनिष्ठ महामृत्युंजय लाभान्वित तुझसे जन-जन है
चेतन से भिन्न तेरा ….
कुंदन से तपे हुए तन को गुरु ने कितना झुलसा डाला उपदेश सुनाते बहुत मगर गुरु ने जीवंत दिखा डाला
चेतन से भिन्न तेरा ये तन चेतन से भिन्न सदा ये तन विद्यासागर गुरुदेव नमन….
शब्द शिल्प एवं स्वर – अवशेष जैन, जबलपुर
मो- 94251 62801 /8770872717
संकलित अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
