आंख खोलकर परमात्मा की मूर्ति के दर्शन किये जाते हैं और आंख मूदकर निज आत्मा का ध्यान किया जाता है वैज्ञानिक संत आचार्यश्री निर्भय सागर महाराज
आगरा
कमला नगर स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर डी ब्लॉक में वैज्ञानिक संत पाठशाला सम्वर्धक आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज ने विशाल धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि जैन धर्म में भक्ति आराधना और अध्यात्म साधना सिर्फ आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए की जाती है। वर्तमान में इतनी अध्यात्म साधना नहीं हो सकती कि आत्मा मोक्ष प्राप्त कर सके लेकिन मोक्षमार्ग पर चलने योग्य साधना आज भी सम्भव है।
प्रत्येक जीवात्मा मोक्ष न मिलने के कारण से नहीं भटक रही है बल्कि मोक्षमार्ग न मिलने के कारण से भटक रही है। आचार्यश्री ने कहा जैसे वायुयान जाने का मार्ग है परन्तु वह हमें आंखों से दिखाई नहीं देता वैसे ही मोक्षमार्ग है। परन्तु वह आंखों से दिखाई नहीं देता।

आचार्यश्री ने आत्मा की व्याख्या करते हुए कहा कि आत्मा को soul इसलिए कहते है कि एस फार सेफ अर्थात जो सुरक्षित अविनाशी है| ओ फार ओनली जो कर्मो का फल अकेले ही भोगती है और अकेले ही जन्म मरण करती है ।

यू फार यूजफुल अर्थात जो उपयोगी है जिसमें ज्ञान दर्शन और चेतना रुप उपयोग पाया जाता है और जल फार लवली अर्थात जो दुनिया में सबसे सुन्दर है।

यही लक्षण आत्मा का जैन धर्म में किया गया है इसलिए आत्मा को अंग्रेजी में सोल कहते है। आचार्यश्री ने कहा यंत्र मंत्र और तंत्र जैन धर्म की देन है। सभी मंत्रों की उत्पत्ति तीर्थंकरों के मुख से हुई है।





तीर्थंकरों के मुख से निकले हुए समस्त बीजाक्षर ऊ, ह्रीं श्रीं इत्यादि रुप द्रव्य ध्वनि में खिरने वाले मंत्र है। आचार्यश्री ने कहा जब व्यक्ति चाबी लेकर दुकान की ओर जाता है तो संसार मार्गी कहलाता है और जब अक्षत आदि चावल लेकर मन्दिर जाता है तब मोक्ष मार्गी कहलाता है।

भगवान के चरणों में अक्षत चढ़ाने से चन्द्र ग्रह की, रक्त चंदन से सूर्य ग्रह की, केसर से मंगलग्रह इलाइची से बुध ग्रह, बादाम से गुरु ग्रह, नारियल की चटक से शुक्र ग्रह की, कमलगट्टा से शनि ग्रह और लोंग चढाने से राहू और केतु ग्रह की शांति होती है। यही वजह है कि प्रत्येक जैनी यह द्रव्य भगवान के चरणों में समर्पित करके दर्शन करता है।
संकलन अभिषेक जैन लुहाड़िया रामगंजमंडी
